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________________ ६०६ } हरिवंश पुराण में लिखा है DADA तदा ।। १५१८।। aver neverter भोगं युग्मानि भुते । anirभोग चक्र सभोगताभ्यधिकं सम्पत्ति इस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को मानते थे । जो दशांग भोगों के भोगने वाले चक्रवर्ती के भोगों की अपेक्षा अधिक थे । उन दश प्रकार के कल्पवृक्षों का इस प्रकार वर्णन किया गया है १. गृहांग नाना प्रकार के उत्तमोत्तम गृह देने वाले हैं । पात्र देने वाले हैं | भोजन देने वाले हैं। मधुररस २. भाजनांग ३. भोजनांग ४. पानांग ५. वस्त्रांग ६. भूषणांग ह 17 [ गो. प्र. चिन्तामरिण "" " 77 वस्त्र 53 रत्नादि श्राभूषण देने वाले हैं । सुगन्ध पुष्प मालाएँ देने वाले हैं। ७. माल्यग ८. दीपांग €. ज्योतिरांग सूर्य के समान प्रकाश देने वाले हैं । १०. तूर्याङ्ग : नाना प्रकार के उत्तमोत्तम भेरी यादि बाजी के देने वाले हैं । तिलोपपति में इन कल्पवृक्ष के विषय में लिखा है ते सब्बे कमावरप्फदी सो अंतरा सब्बे । " चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाश देने वाले हैं । पवर पुढविear पुण्यफलं देति जीवांखं ॥ १५१६॥ - अर्थ- ये समस्त कल्पवृक्ष न वनस्पति रूप हैं और न ये सब व्यंतर रूप हैं । यथार्थ में ये पृथ्वी स्वरूप है, तथा जीवों को उनके पुण्य कर्मों का फल देते हैं । कल्पवृक्षों के सम्बन्ध में महापुराण का यह स्पष्टीकरण है कि ये वृक्ष निसर्गात फलदायिन:' अर्थात् स्वभाव से फल देते हैं । 'नहिभाव-स्वभावानां उपालंभः सुसंगत:' इन वृक्षों का जो स्वभाव है, उसके विषय में दूषण देना उचित नहीं है । जिनसेनः स्वामी कहते हैं :-- दान फसादे फलन्ति विपुलं फलम् । यथास्यपादयाः काले प्राणिनामुपकारकाः ।।१५२०।। जिस प्रकार अन्य वृक्ष अपने-अपने समय पर अनेक प्रकार के फल देकर www
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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