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हरिवंश पुराण में लिखा है
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तदा ।। १५१८।।
aver neverter भोगं युग्मानि भुते । anirभोग चक्र सभोगताभ्यधिकं सम्पत्ति इस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को मानते थे । जो दशांग भोगों के भोगने वाले चक्रवर्ती के भोगों की अपेक्षा अधिक थे ।
उन दश प्रकार के कल्पवृक्षों का इस प्रकार वर्णन किया गया है १. गृहांग नाना प्रकार के उत्तमोत्तम गृह देने वाले हैं ।
पात्र देने वाले हैं | भोजन देने वाले हैं।
मधुररस
२. भाजनांग
३. भोजनांग
४. पानांग
५. वस्त्रांग
६. भूषणांग
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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
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वस्त्र
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रत्नादि श्राभूषण देने वाले हैं ।
सुगन्ध पुष्प मालाएँ देने वाले हैं।
७. माल्यग
८. दीपांग
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ज्योतिरांग सूर्य के समान प्रकाश देने वाले हैं ।
१०. तूर्याङ्ग : नाना प्रकार के उत्तमोत्तम भेरी यादि बाजी के देने वाले हैं । तिलोपपति में इन कल्पवृक्ष के विषय में लिखा है
ते सब्बे कमावरप्फदी सो अंतरा सब्बे ।
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चन्द्रमा के समान शीतल प्रकाश देने वाले हैं ।
पवर पुढविear पुण्यफलं देति जीवांखं ॥ १५१६॥ -
अर्थ- ये समस्त कल्पवृक्ष न वनस्पति रूप हैं और न ये सब व्यंतर रूप हैं । यथार्थ में ये पृथ्वी स्वरूप है, तथा जीवों को उनके पुण्य कर्मों का फल देते हैं ।
कल्पवृक्षों के सम्बन्ध में महापुराण का यह स्पष्टीकरण है कि ये वृक्ष निसर्गात फलदायिन:' अर्थात् स्वभाव से फल देते हैं । 'नहिभाव-स्वभावानां उपालंभः सुसंगत:' इन वृक्षों का जो स्वभाव है, उसके विषय में दूषण देना उचित नहीं है । जिनसेनः स्वामी कहते हैं :--
दान फसादे फलन्ति विपुलं फलम् ।
यथास्यपादयाः काले प्राणिनामुपकारकाः ।।१५२०।।
जिस प्रकार अन्य वृक्ष अपने-अपने समय पर अनेक प्रकार के फल देकर
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