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________________ अध्याय : पाठवां ] महान् अपराध करने वाले पुरुषों के लिये भरत चक्रवर्ती ने वधं बंधन पादिक शरीरिक दण्ड की पद्धति चलाई थी। इस प्रकार जैन धर्म की दृष्टि से दण्ड व्यवस्था के पुरस्कर्ता के रूप में भरतेश्वर का प्रथम स्थान है। .. ऋषभनाथ भगवान् ने प्रजा को शस्त्र संचालन, कृषि करना, वाणिज्य, शिल्प, मसि तथा पशुपालन अादि प्रजा के जीवनोपयोगी कार्यों को बतलाया था, इसलिये वे प्रजापत्ति कहलाये । यथार्थ में अन्य संप्रदाय में कथित प्रजापति की प्रसिद्धि इन ऋषभनाथ भगवान् की ही महिमा को बताती हैं । इन भगवान् ने केवलज्ञान के पश्चात् धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया था । चक्रवर्ती भरत छह खंडों को जीतकर आदर्श राज्य पद्धति की स्थापना की थी। अन्य संप्रदाय में आदर्श राज्य को रामराज्य कहा जाता है । भगवान् मुनिसुव्रतनाथ बीसवें तीर्थंकर शासन काल में महाराज रामचंद्र हुए हैं ! जन दृष्टि से उनको तथा अन्य नीति मार्ग पर पर चलने वाले नरेशों को आदर्श शासक चक्रवर्ती भरत की लोक शासन पद्धति से प्रकाश और प्रेरणा मिलती रही है । सिद्धांतसार दीपक में भी भगवान् ऋषभनाथ को कुलकर कहा है तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत की चक्री कुलकर तथा बध-बंध आदि दण्ड-प्रदाता कहा है । यथा-- वृषभस्तीर्थकृत् पूज्यः कुलकृत विजगद्धितः । ... हा-मा-घिग्नीलिमार्गोक्तोस्य पुत्रो भैरतोऽग्नयः ॥१५१७॥ 'चक्री-कुलकरों जातो वध बंधादिदंडभूत ।' (सिद्धांत सार दीपक) भोगभूमि के युगल और भोग सामग्रो--भोगभूमि में स्त्री-पुरुषों में युगल धर्म पाया जाता था। जिनसेन स्वामी का यह कथन ध्यान देने योग्य है, 'भोगभूमि में जिस समय दम्पत्ति (युगल) का जन्म होता है । उस समय उनके जनक और जननी का देहांत हो जाता है । अतएव वहां के जीयों में पुत्र प्रादि का संकल्प नहीं होता । (पर्व ७-७०) पुरुष को उसकी स्त्री प्रार्य कहती थी और उसे पुरुष प्रार्या कहता था । भोगभूमि के समय में पुरुषों तथा स्त्रियों के यही साधारण नाम थे । लोग सरल प्रकृति के थे । पुरुष को छींक आने पर और स्त्री को जम्हाई आने पर मरण होता था। इन जीवों को प्राजीविका के लिये कष्ट नहीं उठाना पड़ता था। वहां पाँच इंद्रियों को अवर्णनीय सुख सामग्री मिलती थीं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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