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[ गो, प्र. चिन्तामणि ये प्रजा के जीवन का उपाय जानने से 'मनु' कहे मथे हैं । अार्य पुरुषों को कुल की भांति इकट्ठे रहने का उपदेश देने से कुलकर कहलाते थे । कुलों के अर्थात् वंशों के धारण करने से . अर्थात् उनका स्थापन करने से उन्हें कुलकर कहा गया है । युग के प्रारम्भ में जन्म लेने से इन्हें युगादि पुरुष भी कहा है।
.... इन कुलकरों को हरिवंशपुराण में महाप्रभाव सम्पन्न होने के साथ अपने जन्मांतर के स्मरण समन्वित कहा है.।
'महाप्रभावसम्पन्नः स्वभव स्मरणान्वितः । (७-१२५४) हरिवंश पुराण में इनको मन इससे कहा है कि मनुष्यों के प्रयोजत भूत कार्यों का ज्ञान धारण करते थे। 'मननात् मनुजार्थस्य मनु संज्ञा मनुसृतः' (१-१) ..
मनु शब्द मन् धातु से बना है, उसका अर्थ है अवबोधन अर्थात् दूसरों को को बताना । इन महापुरुषों ने समयानुसार प्रजा-जनों को अनेक प्रकार से जीवनोपायों का ज्ञान कराया था
. . . . . . . . . . महापुराण में लिखा है :---
वृषभस्तीर्थकृत्य कुलकृपचव सम्मतः । ... भरतश्चाभूपचैव कुलवच्चंच वरिणतः ।।१५१५॥ '
.. भगवान् वृषभदेव तीर्थंकर थे तथा कुलकर भी माने गये हैं । भरतेश्वर चक्रवर्ती थे तथा कुलकर भी कहलाते थे।
प्रश्न--अपराधी प्रजा के लिये क्या वण्ड दिया जाता था ?
उत्तर---अपराधी प्रजा के लिये दण्डव्यवस्था. का स्वरूप- एक से लेकर पांच कुलकरों ने दोषी मनुष्यों को 'हा' कहकर अर्थात् खेद है कि तुमने ऐसा अपराध किया है, दण्ड की व्यवस्था की थी। आगे के पांच कुलकरों ने 'हा' के साथ 'मा' रूप दण्ड की व्यवस्था की थी, 'हामा' अर्थात् तुमने बुरा किया आगे ऐसा अपराध मत करो। तथा शेष कुलकरों ने 'हामा धिक्' अर्थात् तुम्हें धिक्कार है । इस प्रकार दण्ड की व्यवस्था की थी।. आदिनाथ भगवान् के समय में उक्त प्रकार की दण्ड पद्धति थी विशेष दण्ड व्यवस्था की नियोजना करने में सोलह कुलकर महाराज भरत का नाम पाता है । महापुराणकार कहते हैं.......
शरीर दंडन चैव. बध बन्मादिलक्षणम् । नृसां प्रगलदोषारणां भरतेन नियोजितम् ॥१५१६॥
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