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________________ ३६६ ] प्राप्रच्छना [ गो. प्र. चिन्तामरिए ग्रंथारंभकचोल्लोच काय शुद्धि क्रियादिषु । प्रश्न: सूर्यादिपूज्यानां भवत्या प्रच्छन्नं मुनौ ॥१४॥ ग्रन्थ का आरम्भ, केशलोंच, प्रादि काय शुद्धि की क्रिया में शायादि पूज्य पुरुषों को पूछना मुनि में आप्रच्छन होती है । किसी शास्त्र का आरम्भ, केशलोंच आदि क्रिया करना हो तो श्राचार्य को पूछकर करना चाहिये, इसी को प्रच्छना कहते हैं । प्रतिप्रच्छा- after महत्कार्य कार्य पुष्ट्वा यतीश्वरात् । विनयेन पुनः प्रश्नः प्रतिप्रश्नः प्रकीर्तितः ॥१५॥ जो कुछ छोटा या बड़ा कार्य हो उसको आचार्यों को विनयपूर्वक पूछकर पुनः प्रश्न करना प्रतिप्रश्न कहा जाता है । जो कुछ महान कार्य हो वह गुरु प्रवर्तक स्थविरादिक से पूछकर करना के लिए दूसरी बार उनसे तथा अन्य साधर्मी साधुत्रों से चाहिए, के पूछना वह प्रतिपृच्छा है, ऐसा जानना चाहिये । श्रानिमंत्रण -- पुस्तकrat पुरा दसे रथात्मार्थे निवेदनम् । जिघृक्षायां पुनः सूरि प्रमुखध्वानिमंत्रणम् ॥१६॥ पूर्व में दी हुई पुस्तक यादि में स्व के लिये स्वीकार करने के लिये पुनः ग्रहण करने की इच्छा होने पर आचार्य श्रादि से जो निवेदन किया जाता है, वह निमंत्रण है । पूर्व गुरु श्रादि को दी गई अपनी पुस्तक वा उसकी पुस्तकादि कोई वस्तु पुनः ग्रहण करने की इच्छा हो तो विनय पूर्वक याचना करके लेना चाहिये अथवा पूर्व ग्रहण की हुई पुस्तकादि को पुनः देते समय कोई अब हमें नहीं चाहिये, ऐसा विनय पूर्वक निवेदन करना प्रानिमंत्रण है । संश्रय का स्वरूप और मेद विनय क्षेत्र मार्गाणां संश्रयः सुखदुःखयोः । सूत्रस्य खेत्ययं पंच प्रकारः संश्रयः स्मृतः ॥१७॥
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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