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अध्याय : पांचवां ]
{ ३६५ प्राशीका
स्थिता वयमियत्कालं यामः क्षेमोवयोस्त ते. . इतीष्टाशंसनं यंतरांदेराशी निरुच्यते ॥११॥
सपने कारक महां पर ठहरे थे, अब हम जा रहे हैं, तेरा कल्याण हो, इस प्रकार व्यंतरादिकी प्रशंसा करना इष्ट अशी कही जाती है। - किसी गुफा, शून्य मकान, पर्वत की कन्दरा आदि में ठहरकर पुनः वहां से निकलते समय कहना कि हे व्यंतर देवों, हम इतने काल तक यहां पर ठहरे थे, अब हम जा रहे हैं, तुम्हारा कल्याण हो इस प्रकार के वचनों से व्यंतरादि देवी को पाशीर्वादात्मक वचन कहना प्राशी है। निषिधिका
जीवना व्यन्तरादीनां बाधायै यनिषेधनम् । अस्माभिः स्थीयते युष्मदृष्ट्यैवेति निषिद्धिका ॥१२॥
व्यन्तरादि जीवादि की बाधा के लिये जो निषेध है कि हे व्यन्तर देवों ! हम लोगों के द्वारा तुम्हारी दृष्टि से ही ठहरा जाता है, इस प्रकार कहना निषिद्धिका है।
किसो जिन मंदिर, शून्य गृह, पर्वत की कन्दरा आदि में प्रवेश करते समय हे व्यंतर देव! हम लोग यहां ठहरना चाहते हैं । तुम्हारी दृष्टि से हमारा स्थान निविघ्न हो ऐसा कहना निषिद्धिका है। अर्थात् किसी स्थान में प्रवेश करते समय निःसहि-२ का उच्चारण करना तथा वहां से निकलते समय मासहि-२ का उच्चारण करना प्रासिका और निषिद्धिका है।
प्रवासायसरे कन्दरावासादे निषिद्धिका । तस्मानिर्गमने कार्या स्यादाशीरहारिणी ॥९१३॥
कन्दरावासादि के प्रवेश के समय निषिद्धिका तथा उस स्थान से निकलते समय वैर विरोध को नाश करने वाली प्रासिका करना चाहिए।
शुन्य मकान आदि में प्रवेश करते समय निषिद्धिका और निकलते समय पासिका करना चाहिये, यह आसिका और निषिद्धिका विरोध की नाशक हैं । अन्यथा देवों के साथ विरोध होने की संभावना है । . . . .
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