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________________ ३८४ ] इच्छाकार पुस्तकातrपयोगादेर्यो यात्रा विनयान्विता । स्वपरार्थे यतीन्द्राणां सेच्छाकारः प्ररूपितः ॥१०७॥ पिच्छिका आदि संयम के उपकरण, शास्त्रादि ज्ञानोपकरण, कमण्डलु itareer, safध प्रादि के ग्रहण और प्रतापन योगादि के करने के लिए गुरु से • जो विनय पूर्वक याचना की जाती है, वह इच्छाकार है 1 मिथ्याकार- [ गो. प्र. चिन्तामणि यन्मया दुष्कृतं पूर्वं तन्मिथ्याऽस्तु न तत्पुरः । करोमीति मनोवृति मिथ्याकारोऽति निर्मलः ॥६८ जो व्रतादिक में प्रतिचार रूप पाय मैंने किया हो, वह मिथ्या हो, ऐसे मिथ्या किये हुए पाप को फिर करने की इच्छा नहीं करता और मनरूप अंतरंग भाव से प्रतिक्रमण करता है, उसी के दुष्कृत मिथ्याकार होता है । तथाकार- तत्वाख्यानोपदेशादौ नान्यथा भगवद्वचः तत्तथेत्यादरेणोक्तिस्तथाकारो गुणाकारः ॥ ९०६ ॥ तत्वाख्यान के उपदेश आदि में भगवान के वचन भगवान कहते हैं, वैसा ही है, इस प्रकार आदर पूर्वक कहना, तथाकार ! भगवान सर्वज्ञ ने जो कहा हैं, वह सत्य हैं, क्योंकि भगवान अन्यथा वादी नहीं है । ऐसा दृ favवास करना तथाकार है । इच्छानुवृति पूर्वात्ताननासा पयोगोपकरणादिषु । वृत्ति वृत्तिर्या विनयास्पदा ॥१०॥ अन्यथा नहीं है, जैसा गुणों को करने वाला पूर्व में गृहीत उपवास, प्रतापन, योग पुस्तकादि उपकरणों में जो गुरू की इच्छानुकूल वृत्ति है, वह विनय का स्थान इच्छानुवृत्ति है । आचार्य आदि के द्वारा दी हुई पुस्तक यादि उपकरण के ग्रहण में गुरु की इच्छानुकूल प्रवृत्ति करना इच्छानुवृत्ति (छंदन ) है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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