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________________ अध्याय : पांचवां 4rSinamicintaramanadu- ATY A cadu43RDOli विनय, क्षेत्र, मार्ग का, सूख-दुख का और सूत्र का इस प्रकार यह पांच प्रकार का संश्रय कहा गया है। __ गुरुजनों के लिए मैं आपका हूं, इस प्रकार आत्मसमर्पण करना संश्रय है ! तथा यह विनय संश्रय, क्षेत्र सश्रय, मार्ग संश्रय, सुख या दुख संश्रय और सूत्र संश्रय के भेद से पांच प्रकार का है । विनयसंश्रय-- बोक्ष्यागन्तु कमायांतं यपिमुत्थाय संभ्रमात् । पदानि सप्त गत्वा च कृत्वा तद्योग्यवन्दनम् ॥१८॥ मार्ग श्रान्तिम पोह्यासन प्रवानादियत्नतः । . निरत्नसुस्थितादीनां प्रश्नो विनय संश्रयः ॥१६॥ आये हुए आगन्तुक मुनि को देखकर शीघ्र ही उठकर, सात पैर उसके सम्मुख जाकर और उसके योग्य वन्दना करके, प्रासन प्रदान आदि के यत्न से मार्ग के खेद को दूर करके रत्नत्रय की कुशल पूछना विनय संश्रय है। अन्य संघ के मुनि को अपने संघ में आता हुआ देखकर शीघ्र ही उठकर सात पैर उसके सम्मुख जाकर उसका सत्कार करना, तदनन्तर आसन प्रदान करना, पैर दबाकर मार्ग के खेद को दूर करना, आपका आगमन कहाँ से हुआ है ? आपका स्थान कहा है ? आपके गुरु का नाम क्या है ? आपको रत्नत्रय की कुशलता है, आदि पूछना विनय संश्रय है। क्षेत्रसंश्रय-- व्यक्त्वा दुर्न पमक्षमापं पापं पापिजनाकूलम् । देशं दीक्षोन्मुखापेतं दुभिक्षं क्लेशदायकम् ॥२०॥ निधिसस्यवधश्र व गुणमण्डलम् । क्षेत्रसंश्रयणं तत्राऽऽवासश्चेतः सुखावहः ॥२१॥ पृथ्वीरक्षा नहीं करने वाला दुराचारी राजा, साबध युक्त पाणीजनों से भरे हुए दीक्षा का सम्मुखता से रहित, दुर्भिक्ष से ब्याप्त, क्लेश धायक देश को छोड़कर जिस देश में निधि सस्य के समान गुणों का समूह वृद्धिंगत होता है, उस क्षेत्र में चित्त को सुखकारी आवास करना क्षेत्र संश्रय है। जिस क्षेत्र में राजा नहीं है, अथवा पापी राजा है, क्षेत्र पापाचार या पापी. aamanarasRinkudNTI.::-....-.. .ivRUMEANImonetarnama
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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