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________________ ३९८ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि जनों से व्याप्त है, जो दुर्भिक्ष से पीड़ित हैं, दीक्षा के सन्मुखता से रहित है ऐसे क्षेत्र को छोड़कर, जिस देश में निर्विघ्न व्रतों के समूह का पालन होता है, उस क्षेत्र में रहना क्षेत्र है । मार्गसंश्रय--- प्रागन्तुक सुने मर्ग यातागमन जातयोः । यः सुखा सुखयोः प्रश्नः सोऽयं स्यान्मार्गसंश्रयः ।।६२२॥ श्रागन्तुक मुनि के मार्ग में गमनागमन से उत्पन्न हुए सुख-दुख में जो प्रश्न पूछना है, वह यह मार्गसंश्रय है । आगन्तुक मुनि के मार्ग में सुख-दुख के विषय में प्रश्न पूछना, यह मार्गे संश्रय है । सुखासुखसंश्रय- .. चौर क्रूर गोवंश पीड़ितात सिनाम् । तोषोत्कर्षण माहार भेषजायतनादिभिः ॥२३॥ स्वात्मार्थमहं तुभ्यमीति व सुखेऽसुखे । सच्चित प्रसादार्थं तत्सुखासुख संश्रयः ॥२४॥ चोर, क्रूर, प्राणी, रोम, राजा आदि से पीड़ित होने से दुखी यतिगरणों को आहार, औषध, श्रायतन आदि के द्वारा सन्तुष्ट करना, सुख में और दुख में में तुम्हारे लिए हूं इस प्रकार जो ग्रात्म समर्पण करना है, वह उसके चित्त को प्रसन्न करने के लिए वह सुखासुखसंश्रय है : ورات जिस क्षेत्र में व्रत, संयम, तप की विराधना होती है, दुर्जन राजा व अगामी नों के निमित्त से परिणामों में प्राकुलता होती है, उस क्षेत्र को छोड़कर तप, संगम के वृद्धि कारक क्षेत्र में निवास करना, क्षेत्रसंश्रय है । आगन्तुक मुनि के मार्ग में उत्पन्न हुई सुख-दुख की वार्ता पूछना, मार्गसंश्रय है, तथा मार्ग में उनको किसी चोर ने वा किसी दुष्ट प्राणी ने पीड़ित किया है अथवा कोई रोग उत्पन्न हुआ हो, तो उसको औषधि, ग्रासन, उपकरण आदि देकर दूर करना और आप श्राकुलित न हों, सुख दुख में मैं आपका ही हूँ इस प्रकार आत्मसमर्पण करना सुख-दुख संश्रय है ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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