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________________ m अध्याय : पांचवाँ ] [ ३६६ mainamurtamanira ----- tialinsaninibasinautolianna n पुरा स्वगुरु पादान्ते शास्त्रं च स्वाऽखिसं पुनः । जिज्ञासायां स्वलोकान्यथा ग्रन्यातिशये मुनिः ॥६२५॥ भक्त्योपेत्य गुरुन्नत्वा युधमल्याद प्रसादतः । अन्यन्मुनीन्द्र वृन्दं ते द्रष्टुं वांछः प्रवर्तते ॥६२६॥ .. इत्येवं बहुशः स्पृष्ट्वा लब्ध्वाऽनुज्ञां गुरोर्व मेत् । . तिनकेन वा द्वाभ्यां बहुभिः सह नान्यथा ॥२७॥ प्रथम अपने गुरु के चरणों में सर्वशास्त्रों को सुनकर पश्चात् ग्रन्थों के अतिशय के लिये दूसरे ग्रन्थों को पढ़ने की इच्छा होने पर मुनि भक्ति से गुरु के समीप जाकर नमस्कार करके आपके चरणों के प्रसाद से मेरी दूसरे मुनि समूह के दर्शन ... करने की इच्छा है, इस कार मह तार-चार पूछकर गुरु की अनुमति को प्राप्त कर एक मुनि दो या बहुत से मुनियों के साथ जावे अकेला नहीं जावे । सूत्र, अर्थ और सूत्रार्थ के जानने के प्रयत्न को सूत्रसंश्रय कहते हैं। उसके अर्थ को जानने का प्रयत्न करना अर्थ संश्रय है । सूत्रार्थ का जानने का प्रयत्न करना उभय संश्रय है। इसी को मुलाचार में उपसंयत् कहा है । उसी में सूत्र संश्रय, अर्थ संश्रय, उभय संश्रय, लौकिक, वैदिक और सामायिक के भेद से तीन-तीन प्रकार का कहा है । व्याकरण गणित आदिक लौकिक सूत्र हैं। सिद्धान्त शास्त्र वैदिक कहलाते है । स्याद्वाद-न्याय शास्त्र अथवा अध्यात्मिक शास्त्र सामायिक हैं । जिसने पूर्व में स्वकीय गुरु से सर्व सिद्धान्तों को जान लिया है, पुनः विशेष शास्त्रों के जानने की इच्छा होने पर विनयशील मुनिभक्ति. और अग्दरपूर्वक अपने गुरु के पास जाकर बारबार प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव, आपके प्रासांद से यद्यपि मैंने सारे सिद्धान्त को जान लिया है फिर भी विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मैं सकल शास्त्र के पारंगत अन्य प्राचार्यों के समीप जाना चाहता हूँ, इस प्रकार बार-बार प्रच्छना करे। तदनन्तर गुरु को अनुमति से एक-दो या बहुत से मुनियों के साथ वह दूसरे प्राचार्य के समीप जाने के लिए विहार करे । एकाकी बिहार ज्ञान संहनन न स्वांत भावना बलवन्भुनेः । चिर प्रजितस्यैक बिहारस्तु मतः श्रुते ॥२८॥ inindiATTRACirituatine o Minimelindain P
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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