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[ गो. प्र. चिन्तामणि एतद् गुरण गरणापेतः स्वेच्छाचारसः पुमान् । यस्तस्यकाकिता मा भून्मम जातु रिपोरपि ॥२६॥
बहुत काल के दीक्षित ज्ञान, संहनन, स्वांत भावना से बलशाली मुनि के एकाकी विहार करना शास्त्रों में माना है, परन्तु जो इन गुण समूह से रहित स्वेच्छाचार में रत पुरुष है, उस मेरे शत्रु के भी एकाकी विहार की भी नहीं हो ।
जो ज्ञान बल, संहनन बल, मनोबल और शुभ भावना से युक्त है, बह एकाकी विहार कर सकता है । ज्ञान बल, विशिष्ट आध्यात्मिक ज्ञान का धारी है । संहनन बल, उत्कृष्ट संहनन का धारी हो अर्थात भूख, प्यास सहन करने की शक्ति वाला हो, ग्रात्मानुभूति से अपने मन को वश में करने वाला हो, चिरकाल का दीक्षित हो ऐसा विशिष्ट मुनि एकाकी विहार करने वाला हो सकता है । परन्तु जिसमें यह गुरण नहीं है, जो स्वेच्छाचार में रत रहता है अर्थात् सोने, बैठने, मलमूत्र के त्यागने में वस्तु के ग्रहण करने में स्वच्छन्द होकर प्रवृत्ति करता है ऐसा मुनि कभी एकाकी विहार न करे ।
प्राचार्य खेद के साथ कहते हैं कि इन मुखों से रहित साधु मे शत्रु भी हो तो भी एकाकी विहार न करे। एकाको विहार से हानि
श्रुत संतान चिन्छित्तिर नवस्था यमक्षयः । प्राज्ञाभंगश्च दुष्कोतिस्तीर्थस्य स्याद्गुरोरपि ६३०॥ अग्नितोयग राजीरणसर्प क्रादिभिः क्षयः । स्वस्याप्यात दिकावेक विहारेऽनुचिते यतः ॥३१॥
क्योंकि अनुचित एकाकी विहार करने पर श्रुतज्ञान के संतान की विच्छित्ति अनवस्था संयम का नाश तीर्थ और गुरु को भी आज्ञा का भंग और अपयशस्कोत्ति अग्नि, जल, विष, अजीर्ण और सादिक क्रूर प्राणियों के द्वारा प्रार्तध्यान से अपना नाश होगा।
एकाकी विहार करने से संयम का धात, श्रुत का विच्छेद, दीक्षा देने वाले गुरु को निन्दा, जिनं शासन में कलंक, मुर्खता, कुशीलता आदि अनेक दोष उत्पन्न होते हैं तथा जो स्वच्छन्द होकर एकाकी विहार करते हैं, वे कंटक, चोर, क्रूर पशुओं के द्वारा पीड़ित होते हैं, उनका अजीर्ण रोगादि से आर्तध्यान युक्त होकर मरण होता