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अध्याय : पांचवां ]
[ ४०१ है। अनेक प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए एक, दो, तीन या बहुत से मुनियों के साथ विहार करना चाहिये । एकाकी विहार नहीं करना चाहिये। पांच प्रकार के मुनियों का प्राश्रय क्यों करें--
मयातः सूर्योपाध्याय वर्मक इशिरान्चितम् । गरणं गणधरोपेतमुपेयावीदशाश्वते १९३२॥
अतः ऐसे साधु अपने संघ से निकलकर आचार्य, उपाध्याय, प्रवर्तक, स्थविर से युक्त गरणधर वाले गण को प्राप्त करें।
गुरु की अनुमति लेकर वह तपस्वी दो, तीन मुनियों के साथ अन्य संघ में जाता है, जिसमें प्राचार्य, उपाध्याय, स्थविर, प्रवर्तक और गणधर यह पांच मुनि होते हैं। संघ प्रवर्तक का लक्षण
प्रभावनाधिकोऽयाधमन्नाच: संघवतंकः। जगदादेय वामूसिवर्तकः कालदेशवित् ।।६३३॥
अधिक प्रभावनाकारी अन्न आदि के द्वारा अबाधित रूप से संघ का प्रवर्तक देशकाल को जानने वाला जगत में पादेय है, वचन मूर्ति जिसकी ऐसा प्रवर्तक साधु होता है ।
जो देशकाल का ज्ञाता है, निर्दोष रूप से अन्न औषधि आदि के द्वारा संघ का पोषण करता है, सारे प्राणियों के द्वारा जिनके वचन माननीय हैं, जो जिन धर्म का प्रभावक है, वह प्रवर्तक कहलाता है। स्थविर और गणी का लक्षण
समय स्थिति सद्गीतिः स्थविरः स्याद्गस्थिरः। गणरक्षाक्षम सूरिमुषी गणधरः स्मृतः ।।६३४॥
समय की स्थिति को जानने वाला स्थिर गुरण वाला स्थविर गरण की रक्षा करने में समर्थ गुणी आचार्य गणधर कहलाते हैं।
जो दीक्षादि देकर शिष्यों के उपकार करने में चतुर हो वह प्राचार्य है, जो धर्म का उपदेश देते हैं, शास्त्र पढ़ाते हैं, वे उपाध्याय हैं जो चर्या आदि के द्वारा संघ का उपकार करते हैं, वे प्रवर्तक हैं, जो संघ की रीति, स्थिति, प्राचीन परम्परा की