SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 491
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Aniलासम्म ४०२ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि मर्यादा को जानते हैं, वे स्थविर और जो गरण को पालते हैं, रक्षा करते हैं, वे गरधर कहलाते हैं। प्रागन्तुक मुनि के साथ संघ व प्राचार्य परस्पर एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करें तं प्राप्य तद्गणाधीश मभ्यायांतं सहात्मनः । गणेनाऽऽज्ञानति स्वीकारेच्छावात्सल्य कारणः ॥६३५॥ प्रोत्या प्रेक्ष्याति भक्त्या तं प्रणम्य गणमध्यथ । मार्गातिचार नियम निधान्याः क्रिया अपि ॥६३६॥ वंदित्वा गणनं गणमप्युचित क्रियया दिनम् । तद्विश्रय द्वितीयेऽह्नि तृतीये वासरेऽथवा ।।९३७॥ गणिनं मुरिणनं संघ गुरण संगमवेत्य तम् । यादम शमावश्यक क्रिया करणादिषु ।।६३८॥ सूरि संश्रित्य नत्वेष्टं स्वस्य विज्ञापयेच्छनः । वत्वाऽस्मै : चेतनायेतनासरताजितोधिम् । अपने गरा के साथ सन्मुख पाये हुए उस गरण के अधीश को प्राप्त कर आज्ञा, नति स्वीकार की इच्छा, वात्सल्य आदि कारणों के द्वारा प्रीति से परीक्षा करके प्रति भक्ति से उस गण को नमस्कार कर इसके बाद मार्ग के अतिचार के नियम को और अन्य भी क्रियाओं को निवृत्त कर योग क्रियाओं से सूरि को और संघ को नमस्कार कर उस दिन को विश्रांति लेकर दूसरे दिन में अथवा तीसरे दिन में दया, दम, शम, आवश्यकादि क्रियाकरण आदि मैं गुणशाली संघ के गुणों का समूह उस प्राचार्य को जानकर सूरि के समीप में बैठकर नमस्कार करते हुए मार्ग में प्राप्त हुई चेतन, अचेतन उपधि को उस प्राचार्य के लिए देकर अपने इष्ट को धीरे-धीरे विज्ञापन भरमा समयमा DUCARE शास्त्रज्ञान का इच्छुक संयमी अपने गुरु की अनुमति लेकर प्राचार्य, उपाध्याय प्रवर्तक, स्थविर, गरणी से शोभित पर संघ में जाते हैं, पर संघ के साधु उस पागन्तुक मुनि को देखकर सात पैर उसके सम्मुख जाकर तथा परस्पर में नमस्कार करके रलत्रय कुशल पूछते हैं । तदनन्तर आगन्तुक मुनि और संघ के मुनि परस्पर में एक दूसरे की आज्ञापालन नमस्कार स्वीकार, इच्छा, वात्सल्यादि कारणों के द्वारा परीक्षा करके प्रीति और प्रतिभक्ति से आचार्य को नमस्कार करके आगन्तुक के मुनि मार्ग के
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy