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________________ ६८६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि सामग्गदि रुवं प्रारोगं जोवरणं बलं तेजं । सोहणं लावण्लं सुर धबूमिद सस्सयं प हबे ॥१२१०७॥ सम्पूर्ण इन्द्रियों की परिपूर्णता, नीरोगता, यौवन, बल, तेज, सौभाग्य तथा लावण्य इन्द्रधनुष के समान देर तक टिकने वाले नहीं हैं। आचार्य कुंद-कुंद ने यह कहा है कालाई लद्धीए अप्पा परमाध्पयो हवदि ||२४|| ( मोक्ष पाहुड) काल लब्धि आदि के प्राप्त होने पर आत्मा परम आत्मा होता है । चक्रवर्ती भरत के पुत्र होते हुये श्रेष्ठ प्राध्यात्मिक वातावरण में रहने वाले मरीचिकुमार को सम्यक्त्व की ज्योति नहीं मिली । किंचित् न्यून कोडा - कोडी सागर काल बीतने पर सर्व प्रकार की विपरीत सामग्री होते हुये यम सदृश क्रूर सिंह की पर्याय में चारण मुनि युगलं की वाणी सुनकर उसे श्रधिगमज सम्यक्त्व का लाभ हुआ तथा दशव भव उस जीव ने महावीर भगवान होकर मोक्ष प्राप्त किया । अतः यह स्पष्ट है कि श्रध्यात्मवादी कहने से तथा प्रात्मा सम्बन्धी ग्रन्थ को सदा साथ में रखने मात्र से atra की प्राप्ति काललब्धि के अभाव में असम्भव है । कालब्धि आदि कब आए, यह पता नहीं चलता । ऐसी स्थिति में क्या कर्तव्य रह जाता है ? दो रास्ते हैं । मोक्ष तो मिलता नहीं । विषय-भोग की गुलाबी पथ पकड़ा, तो दुःख पूर्ण पशु तथा नारकी की पर्याय मिलेगी। यदि सम्य व रहित होते हुए भी चोरी, व्यभिचार, बेईमानी आदि विश्व विनिन्दित कुकृत्यों को छोड़कर सज्जन पुरुषोचित सदाचार का रास्ता अपना लिया तो स्वर्ग में उत्पत्ति होगी तथा विदेह जाकर तीर्थकर के साक्षात् दर्शन दिव्यध्वनि सुनने का सौभाग्य तथा नंदीश्वर वंदना आदि अनेक सुयोग प्राप्त होंगे। चरम शरीरी न होने से मरण तो अवश्य होगा । यदि कुद-कुद मुनीन्द्र की कथनी के अनुसार पापाचार का त्याग तथा सदाचार का पालन किया, तो विपत्ति से बचा जा सकेगा। यदि इन्द्रियों की गुलामी और घृणित शरीर की सेवा करते-करते पतन को कौन टाल सकता है ? श्रेणिक महाराज के नरक पतन को क्या है | ? प्राणों का त्याग हुआ, तो कुगति के भगवान महावीर का साक्षात् सानिध्य यदि न रोक सका, व अन्य लोगों की तो बात ही शंका-समयसार में कहा है। शास्त्र अचेतन है, वह ज्ञान रूप नहीं है
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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