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________________ ni अध्याय : दसवां } [६८५ और क्या धर्म करना चाहिये ? उत्तर :- सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तो मोक्ष रूपी परम विज्ञान मन्दिर की प्रवेशिका शाला सदृश है । प्रागे विशारद की शिक्षार्थ श्रावक की एकादश प्रतिमायें हैं। तथा अंतिम कक्षा का कोर्स दश धर्मों का पूर्ण पालन है । कुन्द-कुन्द स्वामी ने श्रावकों की प्रतिमाओं को तथा मुनियों के उत्तम क्षमादिक को धर्म संज्ञा प्रदान की है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अणुवल पालना या महाव्रत पालना धर्म से जीवन को समलंकृत करना है । धर्मानुप्रेक्षा में कुन्द-कुन्द स्वामी कहते हैं एकारस दशभेयं धम्म सम्मत्त पुब्वयं भरिणयं । सागार-गारगाणं उत्तम सुह संपजु-तेहिं ।।२१०।। उत्तम मोक्ष सुखं वाले जिन भगवान ने कहा है सम्यक्त्व पूर्वक एकादश प्रतिमा रूप श्रावक का धर्म है । तथा उत्तम क्षमादि दशविध श्रमण धर्म है। प्राचार्य देव कहते हैं--- साक्ष्य धम्मं चत्ता यदि धम्ने जो हुवा जोयो । सो र य वजदि मोक्खं इदि चितये णिचं ॥२१०६॥ जो जीव श्रावक धर्म को त्यागकर मुनि के धर्म में स्थित होता है । वह मोक्ष से वंचित नहीं होता (यति धर्म पालन द्वारा वह मुक्त होता है ।) इसका सदा धर्म भावना में चितवन करे । यहाँ प्रतादि को धर्म कहा गया है। . प्रश्न :--एक समय सुन्दर प्राध्यात्मिक चर्चा चल रही थी, मैने प्राचार्य १०८ आचार्य शांतिसागर जी महाराज जी से पूछा था, "प्रात्मा की खूब चर्चा करते हुये भी जो व्यक्ति सामान्य श्रावकाचार को प्रतिज्ञा रूप से नहीं पालन करते, उसका भविष्य कैसा है ?.... उत्तर :--आचार्य श्री ने श्रेणिक. राजा का उल्लेख करते हुये कहा था। क्षायिक सम्यक्त्वी होते हुये भी नरक अायु बांध लेने के कारण वह आत्मा ब्रत न ले सकी, इसी प्रकार संयम विमुख व्यक्तियों का स्वरूप समझना चाहिये, . इसके अनंतर उन्होंने कहा था जिसकी जैसी होनहार होती है उसके अनुसार ही उस जीव की बुद्धि हो जाया करती है । प्रमादी एकांतवादी को महर्षि कुद-कुंद चेतावनी देते हुए कहते हैं
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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