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[ गो. प्र. चिन्तामणि ___ 'जो जो देखी वीतराम ने सो सो होसी वीरा रे।' ये लोग लेन-देन, व्यापार, विषय सेवन में बुद्धि पूर्वक प्रयत्न करते हैं तथा वहां भगवान के ज्ञान का बहाना नहीं बनाते । उन्हें अपने मन में यह सोचना उचित होगा--
क्या क्या देखो वीतराग ने तू क्या जाने बीरा रे। वीतराग की वाणी द्वारा, दूर कानो र गोरा है।
अध्यात्म वागी का अभिप्राय था कि जीव रक्षा करो, इसीलिये तो मुनिराज पिच्छी रखते हैं, नहीं तो क्या वह शोभा के लिये है ? भावों में भी प्रमाद पने को न आने दो, क्योंकि मलिन विचारों के द्वारा जोक कमों के बन्धन में बद्ध होता है। उसका रहस्य न समझकर अध्यात्मवादी कहते हैं; शरीर आत्मा से भिन्न है । शरीर घात करने से पाप नहीं होता । इनको समयसार शास्त्र के रचनाकार भाव पाहुड ग्रन्थ में अपना मंतव्य इस प्रकार स्पष्ट करते हुए सचेत करते हैं
परिणवहेहि महाजस चउरासो-लक्ख-जोरिणहि मन्झम्मि । उपजत भरसो पत्तोसि रिपरंतरं दुक्खं ।।२१०३॥
हे महायशस्वी साधु ! जीव बध महापाप है, उसे करने वाला ८४ लाख योनियों में जन्म मरण पाता हुआ निरन्तर दुःख भोगता है।
यहाँ जीव वध को बुरा कहा है ।
चेतावनी-जो कानजी पन्थी समुदाय तीस वर्षों से भी अधिक काल अध्यात्म शास्त्र का ही मनन, प्रचार करते हुये कहता है, हमारा मन त्याग की ओर नहीं जाता है, उसको आध्यात्मिक प्रहरी के रूप में. कुन्द कुद स्वामी भाव पाहुड में इस प्रकार सचेत करते हैं---
उत्थयाइ जा ण जरो रोयम्मी जा सा डहइ देहडि । इन्द्रिय बलं रण वियलइ ताव. लुमं कुणहि अपहियं ।।२१०४॥
जब तक बुढ़ापे का प्राक्रमरण नहीं होता, रोग-रूपी अग्नि देह-रूपी झोपड़ी को भस्म नहीं करती तथा इन्द्रियों की शवित क्षय को प्राप्त नहीं होती है. तब तक। आत्मा का हित करों ! (असमर्थ होने पर क्या करोगे ?) प्रश्न :---इस प्रसंग में यह प्रश्न उठता है आत्म धर्म हम पढ़ते हैं । प्रात्मा
को ही अपने शिविरों में, कक्षाओं में चर्चा करते हैं। अब हमें
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