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________________ अध्याय : दसवां ] सम्यक्त्वी जीव भर पर्याय धारण कर तपश्चर्या करते हुये कर्म क्षय करता है। आगम की आज्ञानुसार दिगम्बर मुद्रा धारण करना, शीत, उष्ण आदि २२ परिषहों को सहन करना, उपवास करना आदि को एकांतवादी जड़ शरीर की क्रिया करते हुए इन्द्रियों और विषयों की गुलामी द्वारा मोक्ष रूपी पात्म स्वातन्त्र्य को पाने का स्वप्न देखते हैं । उसे जगाते हुए कुन्द कुन्द स्वामी ने मोक्ष पाहुड में कहा है विगंथ मोहमुक्का बावीस परीसहा जियकसाया । पायारंभविमुक्का हे गहिया मोक्यमामि ॥२१००॥ जो परिग्रह रहित निर्ग्रन्थ हैं, बाह्य जगत के प्रति मोहमुक्त हैं, शीत, उष्णादि कठोर बाईस परीषह सहन कर तप द्वारा कर्मों की निर्जरा करते हैं, तथा हिंसा, असत्य, चोरी, मैथुन एवं परिग्रह रूप पाप के कारणों का त्याग करते हैं अर्थात् जिनके जीवन में सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह की समाराधना प्रति ष्ठित हैं, वे मोक्ष मार्ग में संलग्न माने गये हैं । __ प्राचार्य श्री यह भी कहते हैं, देव तथा गुरु की भक्ति से युक्त आत्म ध्यानी सच्चरित्र व्यक्ति भोक्ष मार्ग में प्रवृत्त है । एकांतवादी पूजा आदि को राग भाव कहकर निंदनीय कहा करते हैं । सर्वज्ञ परम्परा से प्राप्त मोक्ष पाहुड के इस कथन पर श्रद्धा करने वाला व्यक्ति मोक्षमार्गी होता है--- देवगुरुवं भत्ता रिपक्वेय परंपरा विचितिता। . भाणरया सुचरिसा ते गहिया मोक्स ममामि ।।२१०१॥ जो वीतराग अरहंत भगवान, दिगम्बर गुरु के भक्त हैं, संसार शरीर तथा भोगों से विरभत हैं, ध्यान करने में निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं और जिनका प्राचरण निर्मल हैं, वे मोक्ष मार्ग में स्थित हैं । प्रभादो की दृष्टि---लोक में ऐसे लोग गिला करते हैं, जो दूसरे का द्रव्य देने की बात भी नहीं सुनते, किन्तु अपनी रकम वसूल करने में जघन्य उपयोग करते हैं; इसी प्रकार की परम्परा एकांतवादी वर्ग में देखी जाती है। साधु के जीवन में क्या त्रुटि है, इसे वे ही द ढकर तथा उसे बड़ा रूप देकर दुनिया में ढोल पीटते हैं और स्वयं के पतितजीवन के बारे में कहते हैं कि संयम पर्याय हम में अपने आप पर जायेगी, पुरुषार्थ की जरूरल नहीं है । 4500 स
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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