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________________ ९८२ ] [ गो. प्र. चितिन्मणि जो मोहान्धकार युक्त गृहस्थ विषयों की पूर्ति हेतु बुद्धि पूर्वक प्रयत्न करता हुमा निरन्तर पाप कार्यों को करता है, अर्थात् पाप त्याग रूप पुण्य कार्यों से दूर भागता है, वह निंद्य कार्यों के फलस्वरूप संसार में पतित दशा को पाता है । पंचमकाल में धर्मध्यान रूप शुभोपयोग बड़े प्रयत्न द्वारा प्राप्त होता है। इस काल में शुरल ध्यान रूप शुद्धोपयोग नहीं होता, यह बात मोक्ष पाहुड में कही गयी है भरहे दुस्समकाले धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स । तं अप्प सहावठिदे रगहु मण सो वि अण्णारणी ॥२०६८।। प्रात्मा स्वरूप में लीन साधु के इस पंचमकाल में भरत क्षेत्र में धर्म ध्यान होता है, यह बात जो नहीं मानता वह अज्ञानी (मिथ्यात्वी) है। धर्मध्यान को भावपाहुड की 'सुधम्म'--गाथा ७६ में शुभ भाव कहा है । एकांतवादी अशुभ भाव के विषय में मौन धारण कर शुभ भाव धर्मकान, को इस बात में समलव है की अभद्र शब्दों में निंदा करता है, उसे कुन्द-कुन्द स्वामी कथित लोकातुप्रेक्षा का वर्णन ध्यान में लाना चाहिये । वे कहते हैं प्रसुहेण रिवरय तिरियं सुह उपजोगेण दिविज गर-सोक्खं । सुद्धेरा लहइ सिद्धि एवं लोयं विचितिमो ॥२०६६॥ प्रार्तध्यान, रौद्रध्यान रूप अशुभ भाव से नारकी तथा पशु की पर्याय, धर्म ध्यान रूप शुभ भाव से देव तथा पर पर्याय के सुख मिलते हैं । शुक्ल ध्यान रूप शुद्ध भाव (जो पंचमकाल में नहीं हो सकता) से मोक्ष मिलता है, ऐसा लोक का चितवन करे । इस कथन द्वारा कुन्द-कुन्द स्वामी यह सूचित करते हैं कि इस काल में मोक्ष नहीं है, अतएव अशुभ भाव द्वारा पशु नारकी बनने के स्थान में शुभ भाव को स्वीकार करके देव, मानवपर्याय के सुखों को प्राप्त करना उपयुक्त होगा। Some-this is better than nothing. शून्य की अपेक्षा अल्प उपलब्धि ठीक है। इतना ही नहीं, हिंसा, झूट, चोरी, कुशील, परिग्रह की तीव लालसा कृष्णादि लेश्याओं के अधीन हो कुत्सित पाचरण और क्रूर कर्मों द्वारा कुगति की अपार विपत्ति की अपेक्षा सम्यक्त्व सहित देवादि की भी अवस्था बहुत अच्छी है, जहां से चयकर
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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