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________________ श्रध्याव: दसवां ] [ 85 १ जो मतिज्ञान, श्रुतज्ञान के अहंकारवश जिनवाणी की उपेक्षा कर स्वच्छंद जैसा मन में श्राया वैसा बोलता है, वह जिनमार्ग में संलग्न रहते हुए भी मिथ्यादृष्टि हो जाता है । इस कथन द्वारा कुंद--कुद स्वामी आचार्य परम्परा से श्रागत समस्त ऋषि प्रणीत आगम को ( समंतभद्र, अकलंक, जिनसेन आदि की वाणी ) जो ज्ञान के अहंकार से युक्त हो न मानकर स्वच्छंद प्रलाप करता है, वह मिथ्यादृष्टि है | कानजी मत में समस्त जिनागम का अनादर कर केवल समयसार अथवा कुद-कुद वाणी को ही मानने की प्रणाली है, वह मिथ्यावादी मार्ग है ऐसा महर्षि कुद-कुंद ने पूर्वोक्त गाथा युगल में स्पष्ट किया है । उपवास आदि अनावश्यक है; दान पूजादि के कारण मोक्ष नहीं मिलता, इत्यादि एकान्त कथन कुंद कुंद वाणी के द्वारा भी खण्डित होता है । मार्मिक देशना - वे कहते हैं, जो गृहस्थ, गृहस्थी के जंजाल में रहकर आरंभ परिग्रह में फंसने से पाप का अर्जन करता है, तथा उस दोष प्रक्षालन हेतु दया, दानादि कार्य नहीं करता है, वह संसार में परिभ्रमण करता है । दया दानादि सत्प्रवृत्तियों में लगने वाला सम्यग्ज्ञानी जीव मोक्ष जाता है । ऐसा अभिप्रायः द्वादशानुप्रक्षा में कुंदकुंद स्वामी ने व्यक्त किया है पापबुद्धीए । पुस्तकलत णिमित्तं ग्रन्थं श्रज्जयदि परिहरदि दया दाणं जो पाप भाव युक्त हो सो जीबो भभदि संसारे १२०६६।। (आर्त रौद्र ध्यान को धारण कर ) दया तथा दान का परित्यागकर पुत्र स्त्री के लिये धन का संचय करता है, वह जीव संसार में भ्रमण करता है । अर्थात् दया, दान न करने वाला गृहस्थ मोक्ष नहीं पाता, ऐसा प्रभिप्राय स्पष्ट | इस कथन से दया, दान के विरुद्ध कानजी पंथी एकांतवादी प्ररुपा खण्डित हो जाती है । जो एकांतवादी पाप त्याग के मार्ग को अस्वीकार करके ऊँची-ऊँची बातें शुक्ल ध्यान, शुद्धोपयोगी, निश्चयतय आदि की किया करते हैं, उनकी क्या गति होगी, यह कुन्दकुन्द महर्षि की मंगलवारणी बताती है--- जसे कुइ पाथ विसयणिमित्तं च प्रहरिणसं जीवो । मोहंधसार सहियो तेस दु परिषदि संसारे ॥२०६७।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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