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... [ गो. प्र. चिन्तामरिण
मुनि निदकों को यह बात कही भूतन साहि कि प्राधिक सोयाबी बनने पर भी राजा श्रीशिक द्वारा यशोधर महाराज के गले में मरा सर्प डालने से उपार्जित पाप का पूर्ण रूप से क्षय नहीं हो पाया, और आगामी तीर्थकर होने वाले उन धोगिक राजा के जीव को वर्तमान में नरक पर्याय में अपार कष्ट भोगना पड़ रहा है । अतः . अहंकार को त्यागकर एकांतवादी वर्ग को विवेक से काम लेना चाहिये । मुनि निन्दा को महापाप कहा गया है । .. प्रश्न :- हम वीतरागता को धर्म मानते हैं, अतः दया, दान हमारी दृष्टि
में धर्म कार्य नहीं हैं। शरीर जड़ है। उसके द्वारा किये जाने वाले उपवासादि जड़ किया हैं। मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रांतरिक वीतरागता चाहिये । निश्चयनय हमारा कहता है, मोक्ष के लिए बाहरी वेष से कोई प्रयोजन नहीं है। कषाय आदि का त्याग यदि श्वेताम्बरधारी करता है या वह पीताम्बर बाला या दिगम्बर है तो वह मोक्ष जाता है । इस विषय में हमें कुद-कुद स्वामी का ही अभिप्राय मान्य है, कारण जिनागम के मर्म को स्वामी कुंद-कुब तथा अमृतचन्द्र प्राचार्य के बाद अध्यात्म योगी
सत्पुरुष सम्चे जैन धर्म के प्रवर्तक श्री कानजी जान पाये हैं ? उत्तर :----कुद-कुद स्वामी ने कहा है कि द्वादशांग श्रु तज्ञान तथा प्राचार्य परम्परा से प्राप्त आगम पूज्य तथा मान्य है। उन्होंने दिगम्बर ऋषि प्रसीत परम्परा को आदरणीय कहा है।
उन्होंने रयणसार में कहा है-- पुथ्वं जिणेहि भरिणयं जहट्ठियं गणहरोहि विस्थरियं । पुब्वाइरियकमेणं जं तं बोलेइ सद्दिष्टि ।।२०६४॥ मदिसुद सारण बलेण दु सच्छदं बोलए. जिणुत्तमिति । जो सो होइ कुदिट्ठीण होइ जिए. मम्गलगलो ॥२०६५॥
पूर्व में जिस प्रकार सर्व जिनेन्द्र ने कथन किया तथा गणधरदेव ने जिसका द्वादशांग रूप से विस्तार किया, उस पूर्वाचार्य परम्परा से प्रागत कथन के अनुसार जो बोलता है, वह सम्यग्दृष्टि है ।
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