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अध्याय : दसवां ]
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शास्त्रज्ञ मुनि होते हुये अहंकार का लेश भी उनमें नहीं देखा जाता, जनवरी १९७६ में शिखरजी यात्रा से लौटते हुये वे सिवनी पधारे थे ।
"उनके बारे में 'आचार्य कल्प' शब्द का प्रयोग जब मैंने (पंडित सुमेरचंद जी दिवाकर ने ) किया तब उन्होंने मुझसे कहा "Pandit ji I am an infant only. Dont Praise me highly”-- पंण्तिजी, मैं तो बच्चे के समान रूप हूँ | मेरी बड़ी स्तुति नहीं कीजिये । पचहत्तर वर्ष के होते हुये भी वे मूलाचार प्रतिपादित मुनि अवस्था के frent का बड़ी सावधानी से पालन कर रहे थे। ऐसी अनेक विभूतियों के होते हुये भी एकांतवादी चश्मे वाले उन महापुरुषों को प्रणाम नहीं करते । अहंकार और अविवेक वश ये उनके सत्समागम से अपने जीवन की विशुद्धि नहीं मनाते ।
पंचमकाल में मुनि बनने वालों महापुरुषों में महान् आत्मबल तथा जितेन्द्रि पना है । भाव संग्रह में प्राचार्य देवसेन ने कहा है- चौथे काल में हजार वर्ष तपस्या करने पर जो फल मिलता था, वह इस काल में हीन संहनन होते हुए एक वर्ष की तपस्या द्वारा प्राप्त होता है । वह गाया इस प्रकार है-
बरिस सहस्सेण पुरा जं कम्मं हमइ तेण काग्रेस ।
सं संपइ वरिसे हूं गिज्जरयई हीरणसंहाणे ।। २०६२।।
शास्त्र में देव, गुरु तथा शास्त्र की श्रद्धा को सम्यक्त्व कहा है। उस सम्यक्त्व के अंग रूप साधु परमेष्ठी के विरुद्ध होकर तथा जनमानस को विकृत बनाने से कितना अधिक स्व तथा पर का ग्रकल्याण होता है, यह एकांती वर्ग नहीं सोचता । इस प्रसंग में बौद्ध ग्रन्थ धम्मपद की यह सूक्ति मननीय है-
पापोपि पस्सदि भद्र यान पापं न या व पच्चति पापं अथ पापो पापानि जब तक पाप का फल नहीं मिलता है,
तब तक पापी को पाप कर्म भला कब दिखाई देता है ? किन्तु जब पाप का फल मिलता है, तब उसको पाप दिखता है । भद्रोपि पस्सदि पापं याव भद्रं न पचति । यदा च पति भद्रं श्रथ भद्रो जब तक भद्र कार्य का फल नहीं लगता है, किन्तु जब उस सत्कार्य का फल प्राप्त को अच्छे रूप में देखता है ।
भद्रानि परसति ||२०१३||
प्राप्त होता है, तब तक वह अच्छा नहीं होता है, तब वह व्यक्ति पुण्य कार्य
पश्वति । पस्सति ||