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________________ ९७८ } [ गो. प्र.चिन्तामणि ADMIN दूषित भाय-एक विचारक व्यक्ति ने कहा था, "कानजी भक्तों द्वारा दिगंबर जैनों के गुरु के विरुद्ध प्रचार करने का प्रान्तरिक अभिप्राय दिगम्बर आम्नाय और संस्कृति पर भीतर से प्रहार करना है । लड़-झगड़कर यह काम नहीं होगा। पीटा विष है, जो संस्कृति के प्राणहरणार्थ खिलाया जा रहा है।" दिल्ली के एक जौहरी जैन भाई ने मजेदार बात कही थी कि कानजो पंथी या अन्य भक्त सोनगढ़ के संयम-शून्य बाबा के पास आकर आज्ञा-प्रधानी बनते हैं और दिगम्बर जैन सच्चे वीतरागी मुनियों के पास परीक्षा प्रधानी बनने की बात करते हैं। ये लोग दूरवीक्षण यन्त्र (Telescope) द्वारा पानी के कीड़े देखना चाहते हैं और सूक्ष्मदीक्षरण यन्त्र (Microscope) द्वारा नक्षत्रों का दर्शन करने की इच्छा करते हैं । फल यह होता है कि वे अविवेकवश वस्तु के यथार्थ रहस्य से वंचित होते हैं। एक बार प्राचार्य सम्राट महावीरकोर्ति महाराज के पास कुछ अध्यात्मपंथी पहुंचे थे। दि. मुनियों के विरुद्ध उनसे घंटों बहस की, विद्वान साधु की एक भी बात उनके हृदय में नहीं घुसी। इसका एक कारण है ये लोग अपनी अपनी सुनाने की कला में प्रवीण हैं, दूसरे की सुनने की आदत नहीं है। इसी कारण इनके उपदेशों में शंकाकारों को उत्तर नहीं दिया जाता, और ये दूसरे पक्ष के प्रवचनों में प्रश्न करने को तत्पर होकर सभा भंग करने का प्रयत्न करते हैं । एक प्रांत के मुख्य मंत्री बहिरे थे जब काम की बात होती थी, तब वे कान में श्रवण यंत्र लगाकर बातें सुना करते थे, और जब मतलब की बात नहीं रहती थी, तब उस श्रवण यंत्र को दूर रखकर अभिनय करते थे। महावीर कीति महाराज ने उन प्रश्नकर्तामों से अन्त में पूछा मुनि की परीक्षा करना चाहते हो । बताओं साधुओं के २८ मूलगुरण कौन कौन हैं ? वे चुप हो गये और वहां से चले गये । यह दुर्भाग्य की बात है कि निरंतर साधु निन्दा का उपदेश-सुनते सुनते एकांतवादी इस जमाने में भी अपूर्व व्यक्त्वि सम्पन्न महापुरुष के अंत सौन्दर्य को सोचने में असमर्थ हो जाते हैं ।। उदाहरणार्थ कोल्हापुर के समीपवर्ती गलतमा स्थान के मुनि सिद्धसेन महाराज का जीवन बड़ा सौरभ पूर्ण तथा पवित्रता समलंकृत है। गृहस्थावस्था में वे मैसूर विधान सभा के यशस्वी सदस्य थे। धन धान्यादि से सम्पन्न थे । वे अंग्रेजी में। सुन्दर भाषण देते थे । पचासों प्रतिष्ठायें उन्होंने बिना भेट लिये कराई । महान् AKAR INDICINEMAa ma
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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