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अध्याय : दसवां ] वन्दना न करे । कान की बाबा स्वयं को असमी कहते थे। वे अपने जीवन में संयम को आने भी नहीं देते थे । उनका वन्दनारूप कार्य सम्यक्त्व का पोषक है या विधातक है ? यह बात कान जो पयो प्रवक्ताओं तथा भक्तों को न्यायबुद्धि से सोचनी चाहिये।
कुन्दकुन्द स्वामी असंयमी को वन्दना का अपात्र कहते हैं और हमारे सोनगढ़ पंथी उनको गुरु नहीं, “सद्गुरुदेव", "जैनधर्म के प्रवर्तक" कहते हैं । कुछ भक्तजन उन कानजी बाबा के चरणों की छाप कपड़े में लगवाकर उसको पूजते हैं। कानजी बाबा को अन्धो भक्ति अद्भुत काम करातो हैं । एक कानजी पन्थी प्रचारक भगवान के अभिषेक प्राप्त जल को गन्धोदक न कहकर मन्दोदक--गन्दा पानी कहते थे और स्वयं कानजो बाबा के पैरों को धोने से प्राप्त यथार्थ में गन्दे पानी को अधिक मान देते थे। अद्भुत स्थिति है । भीलनी गजमुक्ता को फेंक देती है और गुजा (गोंगची) को बड़े प्रेम से अपनाती है । मिथ्यात्व का उदय बड़ी विचित्र बातें कराता है । कानजी पन्थी वर्ग को बाल ब्रहावारी उच्च तपस्वी दिगम्बर मुनि भी अनादर योग्य लगते हैं और उन्हें असंयमी व्यक्ति अधिक अच्छा लगता है । यह बुनि मिथ्यात्वी की होती है।
दिगम्बर मुनि विद्वेषी-सन् १६५६ की बात है । कुम्भोज बाहुबली पाश्रम में आत्मार्थी नामधारी सत्पुरुष छह-सात सौ यात्री ठहरे थे । वहां से करीब दो किलोमीटर पर सत्तानवे वर्षीय मुनि १०८ वर्धमानसागर महाराज (जो प्राचार्य शांतिसागर महाराज के ज्येष्ठ बन्धु थे) मन्दिरजी में थे ! बाहुबली प्राश्रम वालों ने कहा था, "स्वामीजी ! यहां समीप में महान् प्राध्यात्मिक मुनिराज वर्धमानसागर महाराज का दर्शन कीजिये ।" मुनि-विद्वेषी हृदय होने से उन लोगों ने उस जिन मन्दिर का ही दर्शन नहीं किया। साक्षात् मुनि को देखकर उनका अनादर करना और कल्पनागत मुनि को प्रणाम की बातें करना यह स्पष्ट करता है कि यथार्थ में उनके दिल में दिगम्बर मुनि के प्रति अान्तरिक विद्वेष विद्यमान था । परिग्रहधारी की पूजा और अपरिग्रहीं महान् योगियों का निरादर आन्तरिक दूषित मनोदशा को स्पष्ट करते हैं । इससे असली सम्यग्दृष्टि और मिथ्यात्वी का रूप पूर्णतया समझा जा सकता है। एक नीतिकार कहता है--
सर्प उस्यो तब जानिये, रुचि कर नीम चचाय । कर्म इस्यो सब जानिये, जिनवाणी न सुहाय ॥२०६१।।
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