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________________ ६७६ ] [ गो. प्र. चिन्तामणि इस काल में क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं होता है। इस कारण दातार या पात्र के भावों में अनेक बार सामस्व का पाना तथा जाना संभव है, इस बात को सीमंधर स्वामी सदृश महाज्ञानी जान सकते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न इस काल का व्यक्ति नहीं जान सकता। ऐसी स्थिति में आहार दान का क्या हाल होगा ? दातार का सम्यक्त्व अंतरंग से चल गया, तो दातार पाहार लेना बन्द कर देगा ? ऐसी व्यर्थ की झंझटों में स्वयं को डालना पाल्म कल्याण करने वाले विवेकी को उचित नहीं है। चौथे काल की बात है । वारिषेण मुनि ने द्रश्यलिंगी मुनि पुष्पजल को अपने साथ रखकर बड़ो कुशलता पूर्वक उनको सच्चा मुनि बनाया था। इस कारण स्थिति करण नामक सम्यक्त्व के अंग में वारिषेण मुनि मान्य कहे गए हैं । द्रव्यलिंगी पुष्पजल मुनि को धार्मिक जन अाहार देते थे। सुन्दर लाई-नन --कालिपी, गिी की जटिल समस्या का सुन्दर समाधान आशावर जी ने. सांगारधर्मामृत में इस प्रकार किया है.-~-पाधारणादि को प्रतिमाओं में जिनाकार होने से स्थापना निक्षेप द्वारा उन्हें जैसा पूजा जाता है तथा पूजक स्थहित सम्पादन करता है, उसी प्रकार वर्तमान में दिगम्बर मुनि मुद्राधारी साधु में पूर्वकालीन मुनियों की स्थापना कर आराधना करनी चाहिये । सागारधर्मामृत के शब्द इस प्रकार हैं विन्यस्यैदं युगीनेषु प्रतिमाषु जिनानिय । भक्त्या पूर्व मुनीनचेत् कुतः श्रेयोति विनाम ।। कुंद कुंद स्वामी ने दर्शन पाहुड में मार्मिक बात कही है---जो सहजोत्पन्न अर्यात दिगम्बर रूप को देखकर ईष्यविश आदर नहीं करता, वह संयम युक्त होता हुआ भी मिथ्यात्वी है । वह उपयोगी गाथा इस प्रकार है--- सहजुष्पण्णं रूवं दट्टे जो मण्णए रण मच्छरियो । सो संजम पडिवण्यो मिच्छा इट्ठी हवा एसो ॥२०६०॥ आगम कहता है पञ्चमकाल के अन्त तक अर्थात् आज से १८५०० वर्ष बाद तक भी दिगम्बर मुद्राधारी मुनि होंगे । वे अन्तिम मुनि समाधि सहित मरण करेंगे। उनको अवधिज्ञान प्राप्त होगा, ऐसा त्रिलोकसार तथा तिलोयपण्यत्ति में कहा है। स्मरणीय---हमारे प्रात्मार्थी मुमुक्षु भाइयों को कुन्दकुन्द महर्षि के इन वचनों को विचारपूर्वक ध्यान से पढ़ना चाहिये, "असंजद ग वन्दे' ( २६ )- असंयमी की । -
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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