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________________ LANnavimum-' - अध्यायः : दसवां ] [ ६७५ शंका :-~-हमारे बारे में यह कहा जाता है कि हम लोग मुनि को नहीं मानते । हम मुमुक्षु णमोकार मंत्र पढ़ते समय "रणमो लोए सन्च साहूण" पाठ पढ़कर सभी सच्चे भावलिमी मुनीश्वरों को प्रणाम करते हैं । वर्तमान मुनि धलिगी हैं; अतः हम उनको प्राराध्य नहीं मानते, कारण हमारे परम पूज्य कुदकुद भगवान ने 'दसरण पाहुड' में कहा है "दसरण होतो शिवो" (२) सम्यग्दर्शन हीन व्यक्ति को नमस्कार नहीं करना चाहिये ? समाधान :-अंतरंग भावों का परिज्ञान केवली भगवान को होता है तथा मनः पर्यय ज्ञानी महर्षि मनोगत बात को जानते हैं। गृहस्थ के श्रु तज्ञान में दूसरे के सम्यक्त्व है या नहीं, इसको जानने की क्षमता नहीं है। मुनि जीवन के आधारभूत महाबत, दिगम्बर मुद्रा आदि को देखकर मुनिराज को प्रणाम करने का आगम में कथन है। जिनेश्वरी मुद्रा धारण करने वाले, नकली मुनि बनने वाले देव से सम्यक्त्वी उदयन ने धुणा नहीं की तथा उनको सच्चा साधु मान परिचर्या की । इससे सम्यकत्व के निविचिकित्सा अंग पालने वालों में राजा उद्दायन का उदाहरण दिया जाता है। आदिनाथ भगवान पूर्व भव में ब्रजजंघ राजा थे । उनके सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी श्रीमती रानी (जो आगे भत्र में महादानी राजा श्रेयांस हुई) के साथ चारण ऋद्धिधारी भावलिंगी मुनि युगल को आहार दिया था, जिससे पंचाश्चर्य हए थे। उदायन राजा के कथानक में दाता सम्यक्त्वी था, पात्र सम्यक्त्वी नहीं था। मुनि मुद्रा का सम्यक्त्वी राजा ने सम्मान किया। इस प्रकार अाज भी अपने को सम्यक्त्वी मानने वाला यदि जिन मुद्राधारी साधु को आहार देता है, तो उसके सम्यक्त्वी पने पर संकट का पहाड़ नहीं टूटेगा। .. वज्रजंघ राजा का कथानक यह बताता है, कि भावलिंगी ऋद्धि मुनि युगल ने द्रव्यलिंगी गृहस्थ के द्वारा प्रदत्त श्राहार लिया था। राजा ब्रजजंघ के सम्यक्त्व नहीं था, ऐसा महापुराण में कहा है। श्रावक का प्राचार व्यवहार, धर्मातुसार होना चाहिए। उसके अन्तरंग भाव के आधार पर लोक व्यवस्था नहीं बनती । उपशम तथा क्षयोपशम सम्यक्त्व प्रसंख्यात बार उत्पन्न होते हैं। ऐसा पागम है । R ANTEETTEERSSRHIKARIHANEKORAKI NATAR PARA
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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