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[ गो. प्र. चिन्तामणि
शंका :-- ब्राश्चर्य है । आत्मार्थी सत्पुरुष पूज्य कानजी महाराज को स्वामी कहे जाने पर आप लोग ऐतराज करते हैं ? ऐसे ही हम लोगों को मुमुक्ष कहे जाने पर आप लोग प्राक्षेप क्यों करते हैं ?
समाधान :- " स्वामी" शब्द मालिक का पर्यायवाची है । दिगम्बर जैन धर्म में परिग्रह त्यागी इन्द्रियों को वश करने वाले मुनि को स्वामी कहा जाता है । स्वामी इन्द्रियों का दास नहीं होता है । जिसे इन्द्रियों ने अपना गुलाम बना लिया है। उसे स्वामी कहना ऐसी ही बात है जैसे दरिद्र व्यक्ति के पुत्र का नाम करोड़ीमल रखना अथवा सूरदास को नैनसुख नाम प्रदान करना । जब कानजी स्वयं अपने को व्रती संयमी कहते हैं । तब इन्द्रियों के सेवकों को उनको स्वामी अर्थात् इन्द्रियों का विजेता कहना उचित नहीं है । वैसे आपको अधिकार है। आप एक दूरी झोपड़ी को शौक से राजमहल कहे, मुमुक्षु का रहस्य "मुमुक्षु" शब्द का प्रयोग समंतभद्र स्वामी ने ऋषभनाथ भगवान के स्तन में किया है। जब उन्होंने नीलांजना के नृत्यं को देखकर विषयों से विरक्त हो, राज्य का परित्याग किया था । श्राशाधरजी ने सागार धर्मामृत में उस गृहस्थ के लिए भी मुमुक्षु शब्द का उपयोग किया है । जो हृदय में मुनि बनने की सच्ची कामना करता है । 'देशविरतिः खलु सर्व विरति लालसा ।" जहां जीवन संयम को सुवास से सम्पन्न न हो तथा विषय भोगों से छूटने के बदले में उसके जाल मे फंसने का ही निरन्तर काम चले वहां मुमुक्षु शब्द का उपयोग अद्भुत लगता है । यह हिंसक को दयासागर कहने सदृश वचन हैं । मुमुक्षु शब्द के चार भेद हो सकते हैं नाम, स्थापना, द्रव्य तथा भाव रूप से चतुविध मुमुक्षु हैं । व्रत नियम शून्य तथा सदाचार विरोधी व्यक्ति यदि श्रपने को मुमुक्षु कहते हैं, तो वे नाम मात्र के मुमुक्षु हैं। किसी वस्तु में मुमुक्षु की स्थापना करना, स्थापना मुमुक्षु है । जो व्यक्ति परिग्रह पिशाच के चक्कर से छूटकर जीवन में साधुत्व की भावना करते हैं, वे द्रव्य मुमुक्षु हैं । परिग्रह त्यागकर आत्म प्रकाश से जिनकी आत्मा अलंकृत है, वे भाव मुमुक्षु हैं ।
एक कमजोर आदमी है, जो बिना सहारे के बड़ा तक नहीं हो सकता, उसे पहलवान कहने सदृश संयम से डरने वालों तथा संयमी से भयखाने वालों को मुमुक्षु कहना | शब्द का गलत प्रयोग देखकर ऐतराज करना न्यायोचित बात है । इसमें विद्वेष नहीं है । इसके भीतर पवित्र सत्य विद्यमान है ।