SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1077
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : इन ] [ ९८७ "संत्थं पारणं ण हवाई जह्मा सत्थं रण जागए कि चि ॥३६॥ समयसार गाथा ३७२ में कहा है एक द्रव्य अन्य द्रव्यों में गुणोत्पादक नहीं होता । "अणदविएण प्रादवियस्स ए कीरए गुणुगानो" इस कारण कानजी कहते हैं, शास्त्र को परस्त्री तुल्य त्याज्य समझना चाहिये। समाधान-शास्त्र के पठन स्वाध्याय तथा उपदेश से जीव सुपथ में लगते हैं। यह प्रत्यक्ष अनुभव गोचर बात है, कानजी पंथ अपने प्राचार के लिये अपने ढ़ग का साहित्य छपाता है, वितरण करता है। यह कारण स्पष्ट सूचित करता है कि एक द्रव्य के द्वारा दूसरे का कुछ नहीं होता, यह कथन एकांत रूप नहीं है । समयसार में कुन्द कुन्द स्वामी ने एक दृष्टि से कथन किया है उसके सिवाय उन्होंने दूसरी दृष्टि को भी ध्यान में रखकर रयणसार में लिखा है इदि सज्जरंग पुज्ज रयरसार गंथं पिडालसो पिच्छ । जो पढ़ई सुरगइ भावइ सो पावई सासयं ठाणं ॥२१०८।। इस प्रकार सत्पुरुषों के द्वारा वंदनीय इस रयनसार ग्रंथ को जो प्रातस्य छोड़कर पढ़ता है, सुनता है, भावना करता है, वह अविनाशी पद को पाता है । यही बात भाव पाहुड में अन्त में उन्होंने लिखी है--- इथ भाव पाहुड मिणं सव्वं बुद्ध हि देसियं सम्म । जो पढइ सुगइ भावइ पावइ सो अविचलं ठाणं ॥२१०६।। मोक्ष पाहुड के अन्त की गाथा भी उपयोगी है-- एवं जिरण पत्तं मोक्खस्सय पाहुड सुभत्तीए। जो पढइ सुरगइ, भावइ सो पायइ सासयं सोक्खं ।।२११०॥ कुन्द-कुन्द स्वामी स्वयं कहते हैं कि उनके द्वारा रचित उपरोक्त ग्रंथ को जो पढ़ता है, सुमता है तथा भावना करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है । अतः जिनवाणी को परस्त्री कहकर हेय मानना, एक द्रव्य से दूसरे का सर्वथा हित नहीं होता, अादि कथन कुन्द-कुन्द स्वामी के कथन द्वारा बाधित होता है। विवेकी व्यक्ति एकांत पक्ष को नहीं पनड़ता । एकांत पक्ष का प्राग्रह सम्यक्त्वी नहीं करता है। यह बात विचारणीय है कि कुन्द-कुन्द स्वामी का सीमंघर भगवान की दिव्य B initionalistianima
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy