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[ गो. प्र. चिन्तामणि ध्यनि रूप पुद्गल द्रव्य से स्वहित न होता, तो वे महर्षि विदेह क्यों जाते? अतः कथंचित् एक द्रव्य दूसरे का उपकारी होता है, कथंचित् नहीं होता ; ऐसा स्याद्वाद पक्ष उचित तथा उपकारी है। प्रश्न :--पुण्य के विषय में यह बात गले नहीं उतरती कि वह प्रात्मा
का शत्रु रूप कर्म है, वह मोक्षार्थी के लिये कैसे उपकारी हो
सकेगा? .. . • उत्तर :--अनेकांत के प्रकाश में समाधान खोजना चाहिये। पुण्योदय से प्राप्त सामग्री का उपयोग चतुर व्यक्ति स्व' परहित के साधनों में करता है । क्रूर तथा दुष्ट व्यक्ति उस साधन सामग्री का उपयोग विषयः कषायों के पोषण में करता है । इस प्रसंग में यह पद्य उपयोगी है- ..
विद्या विवादाय धनं मवाय शक्तिः परेषां परपीड़नाय । खलस्य साधोः विपरीत मेतानाय दानाय च रक्षणाय ॥२१११॥
दुर्जन विद्या का उपयोग विवाद में, धन का अहंकार पोषण में तथा शक्ति का उपयोग दारों को काट प्रदान करने में करता है। सत्पुरुष विद्या का ज्ञान कार्य में, धन का पात्र दान में तथा शक्ति का असमयों के रक्षण कार्य में उपयोग करता है।
मिथ्यादृष्टि पुण्योदय से प्राप्त सामग्री को पापानुबन्धी क्रियाओं में लगाता है । जैसे के बहुत धन सम्पत्ति हो गई, और उसने कसाई खाना खोल दिया, मांस विक्रय, मद्य विक्रयादि का बड़े रूप में काम शुरू कर दिया, हीन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन हेतु सम्पत्ति का उपयोग किया । उसके फल स्वरूप वह अपने संचित पुण्य का क्षयकर पाप के सागर में डूबता है।
यदि वह धन वैभवं आदि सम्यग्दृष्टि विवेकी सत्पुरुष को प्राप्त हुआ, तो वह उसके द्वारा रत्नत्रय के अंगरूप कार्यों का संरक्षण, संवर्धन, जीव हितादि का कार्य सम्पन्न करता है । इससे वह घातिया कर्मरूप पाप का क्षय करता हुआ तथा अन्त में उस वैभव मात्र का त्यागकर भगवान शांतिनाथ के समान स्वदोष शान्ति द्वारा शाश्वतिक शांतिपूर्ण पद को पाता है । जिस व्यक्ति के पास धन मादकता पैदा करता है, उस व्यक्ति का हाल निन्दनीय कहा जाता है।
__इस कारण पुण्य के विषय में स्याद्वाद दृष्टि का उपयोग जरूरी है । श्रीषण राजा ने सत्पात्र दान दिया था, उससे उसके अपार. पुण्य वृद्धि होती गई, तथा उसने
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