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अध्याय : दसवां ]
[ ६८६ वैभव का सत्कार्यों में उपयोग किया। अन्त में वह आत्मा भगवान शांतिनाथ तीर्थकर होकर मोक्ष धाम में विराजमान हो गई ।।
__ मार्मिक विचार-इस प्रसंग में एक बात ईमानदारी से हृदय पर हाथ रखकर विचारने की है। एकांतवादी वर्ग अपना सारा दिन "हाय धन, हाय पैसा" से प्रेरित हो पुण्य रूपी वृक्ष के फल को संग्रह करना चाहता है और कहता है हमें पुण्य नहीं चाहिए । कोई आम के शौकिन सज्जन आम तो खाना चाहें और आम के वृक्ष से घृणा करें, तो उनकी यह चेष्टा समझदारों को मनोविनोदप्रद है। यदि ग्राम का वृक्ष नहीं चाहिये, तो उसके फलों का भी त्याग करो, तब विवेक की बात समझी जाये ।
तीर्थकर भगवान दीक्षा लेते समय पुण्य से प्राप्त फल रूप सामग्री का जीर्ण कपड़े के समान त्याग करते हैं और अंतरंग बहिरंग रूप से अपरिग्रही बनते हैं, तब वें पाप का क्षय करते हुए पुण्य का भी नाश कर सिद्ध पदवी पाले हैं। अतः विवेक के प्रकाश में तत्व पर दृष्टि डालना समझदारी की बात है।
एकांत पक्ष वालों का सच्चा हित स्याद्वाद चक्र का शरण ग्रहण करने में है। स्यावाद का शरण लेने वाला ही मोक्ष पाता है ।
बनारसीदास ने स्याद्वाद दृष्टि के विषय में नाटक समयसार में मार्मिक शब्द लिखे हैं
समुझे न ज्ञान कहे करम किए सो मोक्ष । ऐसे जीव विकल मिष्यात की गहल में । ज्ञान पक्ष गहे, कहे पातमा प्रबंध सदा में। घरते सुछन्द, तेउ डूबे हैं चहल में ।।। जथायोग करम करें, ते ममता न धरे। . रहें सावधान, ध्यान की टहल में। सेई भवसागर के ऊपर ह तरै जीव । जिन्हें को निवास स्यादवाद के महल में ॥ .
सामान्य पथ-आत्महित साधना जिनका ध्येय हैं, वे शास्त्र का उपयुक्त और उपयोगी अंश ग्रहण कर जीवन शोधन के कार्य में प्रयत्नरत रहा करते हैं। समन्वय दृष्टि वाला साधक शास्त्र के अर्थ को उसके प्रसंग, प्रकरण आदि को ध्यान में रखकर
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