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[ मो. प्र. चिन्तामणि वस्तुस्वरूप को मन में प्रतिष्ठित करता है। अध्यात्म दृष्टि और व्यवहार दृष्टि का समन्वय न होने पर शास्त्र जीवन को उन्मत नहीं बनाता है। इस विषय को स्पष्ट करने के लिए कुछ उदाहरण यहां दिये जाते हैं।
.. अध्यात्म दृष्टि की मुख्यता से कहा जाता है, आत्मा अविनाशी है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती। पूज्यपाद ऋषिराज ने इष्टोपदेश में कहा है "न मे मृत्युः कुतो भीतिः ।" इस दृष्टि वाले सत्पुरुष को यह आर्षवाणी भी स्मरण में रहनी चाहिए "समाति मरणं होहु मज्झ" मेरे समाधिमरण हो। पंचमकाल में शरीरी मानव का जन्म नहीं होता है । उसकी मृत्यु अवश्य होगी । न मे मृत्युः का पाठ पढ़ने-पढ़ाने वाले महर्षि पूज्यपाद को समाधिमरण पर भी ध्यान देना आवश्यक समझा। उन्होने भगवान से प्रार्थना की है, "प्राण प्रयाण क्षरणे त्वन्नाम-प्रतिबद्ध वर्ण पड़ने कण्ठस्त्वकुष्ठो मम" प्रारा प्रयास काल में जिनेश्वर के नाम स्मरण करते समय मेरा कण्ठ अवरुद्ध न हो। विवेकी साधक समाधिमरण को ध्यान रखता है तथा मेरो प्रात्मा की मृत्यु नहीं है, . इस सत्य पर भी अपनी दृष्टि रखता है।
प्रध्यात्मदृष्टि कहती है, आत्मा ही आत्मा का है, "प्रात्मैव गुरुरात्मनः" समाधि-शतक में लिखा हैं---
नयत्यात्मान मात्मैव जन्य निर्वाण मेव वा। गुरुरात्मात्मन स्तस्मानान्योरिस परमार्थतः ॥२११२॥
आत्मा ही आत्मा को संसार में तथा निर्वाण में ले जाता है, इससे परमार्थ से आत्मा का गुरु आत्मा है, अन्य गुरु नहीं हैं।
इस दुष्टि के साथ व्यवहारं दृष्टि भी साधक को अपनानी चाहिये, ताकि वह उसके जीवन निर्माण करने में पथ प्रदर्शक प्राचार्यादि को अपनी श्रद्धा तथा विनय का केन्द्र बनावे । बोध पाहुड में कुन्द-कुद स्वाभी अपने गुरु द्वादशांग के वेत्ता भद्रबाहु श्रुतकेवली को इस प्रकार स्मरण करते हैं ----
बारस अंग चिया चउरस पुटध-विडल विस्थररणं । सुयसारिण भद्दबाहू गमय-गुरु-भयवयो जय ॥२११३॥ द्वादशांग विज्ञानः चतुर्दश पूर्वांग विपुल विस्तारः। श्रु लजानी भद्रबाहुः गमगुरुः भगवान् जयतु ॥२११४।।
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