________________
७०४ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि पिता की कल्याणमयी आज्ञा को ही मानों शिरोधार्य करते हुये वृषभ पुत्र ने मोक्ष के साक्षात् मार्ग स्वरूप महाव्रतों को अंगीकार कर मुनि पदवी प्राप्त की और सप्तऋद्धि से शोभायमान होकर प्रथम गणधर पद की प्रतिष्ठा प्राप्त की। उनके विषय में महापुराणकार के शब्द ये हैं...
योऽसौ पुरिमसालेशो, भरसस्यानुजः कृती। प्राज्ञः शूरः शुचि धीरो, धौरेयो मानशालिनाम् ॥१५४३॥ श्रीमान् वृशभसेनाख्यः प्रज्ञापारमिसो वशी। स सम्बुध्य गुरोः पाश्वे दीक्षित्वाऽभूद् गणाधिपः ।।१५४४॥
उसी समय कुरुवंश के शिरोमणि, महाराज थे यांस, महाराज सोमप्रभ तथा अन्य राजाओं ने मुनिदीक्षा धारण कर वृषभसेन स्वामी के समान गणनायकों के पद प्राप्त किये।
जिस सर्व परिग्रहत्याग वृत्ति को सिंहवृत्ति मानकर शृगाल स्वभाव वाले जीव उरा करते हैं, उस पदबी को निर्भय होकर धारण करने में लोगों का साहस वृद्धिंगत हो रहा था। भारत महाराज की छोटी बहन ब्राह्मी ने कुमारी अवस्था में ही वैराग्य भाव जागृत हो जाने से प्रायिका की श्रेष्ठ पदवी प्राप्त की। - गुरुदेव के अनुग्रह से कुमारी ब्राह्मी ने दीक्षा लेकर आर्यिकानों के मध्य परिणनी का पद प्राप्त किया था। प्रायिका ब्राह्मी की देवतानों ने पूजा की थी।
___ बाहुबलि कुमार की सगी बहिन कुमारी सुन्दरी ने भी बहिन ब्राह्मी के. समान जिन दीक्षा धारण कर नारी जाति को गौरवान्वित किया था । उस समय श्रुत कीर्ति नामक गृहस्थ ने श्राक्कों के उच्च व्रत ग्रहण किये थे । यह देशवती श्रावकों में प्रमुख था।
भरत के भाई अनन्तवीर्य कुमार ने भी भगवान से मुनि दीक्षा लेकर अपूर्व विशुद्धता प्राप्त की इस युग में केवल ज्ञान प्राप्त करके मोक्ष जाने वाले पूज्य पुरुषों में । अनन्तवीर्य भगवान का सर्वोपरि स्थान है । कहा भी है
संबोऽनंसवीर्यश्च, गुरोः संप्राप्तदोक्षणः । सुरवातपूविरग्रिमो मोक्षवत्तामभूत् ॥१५४५।।
कुमार अनन्तवीर्य ने प्रतिबोध को प्राप्त करने के पश्चात् भगवान से दीक्षा ली । देवों के द्वारा पूजा प्राप्त की ! वे अन्तवीर्य इस अवसपिणी काल में मोक्ष