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अध्याय : आठवां ]
[ ७०५ जाने वाले में अग्रणी हये है।
भगवान के साथ दीक्षा लेने वाले तथा पश्चात् भ्रष्ट हुये समस्त राजाओं ने भगवान की वाणी को सुनकर अपने मिथ्यात्व का परित्याग कर जनेश्वरी दीक्षा धारण की । मरीचिकुमार का संसार भ्रमण अभी समाप्त नहीं हुआ था, अतः उस मरीचिकुमार ने मिथ्यामार्ग प्राश्रय नहीं छोड़ा। कहा भी है---
मरीचिवाः सर्वेऽपि, तापसास्तपसि स्थिता। भट्टारकान्ते संध्य, महाप्रावाज्येऽवस्थिताः ।।१५४६॥
मरीचिकुमार को छोड़कर शेष सभी कुलिगी साधुओं ने भट्टारक ऋषभदेव के समीप प्रति बोध को प्राप्त कर महाशाज्य अर्थात् पञ्च महाव्रतों की दीक्षा ग्रहण की।
भरत महाराज सदृश महान ज्ञानी के छोटे भाई, छोटी बहिन कुमारी श्राह्मी आदि ने दीक्षा ली, किन्तु भरत महाराज अयोध्या को लौट गये और दिग्विजय आदि संसारिक चिंताओं में संलग्न हो गये, क्योंकि उनके परिग्रह परित्याग की पुण्य बेला अभी समीप नहीं आई थी। जब काललब्धि का योग मिला, तो दीक्षा लेकर भारत सम्राट शीघ्र ही ज्ञान साम्राज्य के स्वामी बन गये । मुनि पदवी लेने के पश्चात उन्हें फिर पारणा करने तक का भी प्रसंग नहीं प्राप्त हुआ । उत्तर पुराण का यह कथन कितना अर्थ पूर्ण है
आदितीर्थकृतो ज्येष्ठ पुत्रो राजसु षोडश । ज्यायांश्चक्री मुहूर्तेन मुक्तो यं कस्तुलांवजेत् ॥१५४७।।
आदिनाथ तीर्थंकर के ज्येष्ठ पुत्र, सोलहवें मनु प्रथम चक्रवर्ती भरत महाराज ने अन्तर्मुहुर्त के अन्तर ही केदल्य ज्ञान प्राप्त किया था। उनकी बराबरी संसार में कौन कर सकता है ?
प्रश्न-तीर्थङ्कर भगवान में लक्ष्मी और सरस्वती की मैत्री किस प्रकार
पाई जाती है ? .. उत्तर- संसार में यह बात प्रसिद्ध है कि सरस्वती और लक्ष्मी में इतना विरोध है कि किसी भी पुरुष में दोनों का एक साथ निवास नहीं पाया जाता है।
तीर्थकर भगवान में इन दोनों की मैत्री स्पष्ट नयन गोचर होती है । समन्तभद्र स्वामी : ने पद्मप्रभ भगवान के स्तवन में कहा है कि जिनेन्द्र देव ने सरस्वती तथा पद्मा अर्थात
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