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[ गो. प्र. चिन्तामणि लक्ष्मी को मुक्ति श्री के अभिमुख होने के पहले धारण किया था । 'बभार पद्मा च सरानी च भवान पुरस्तात् प्रतिमुक्तिलक्ष्याः'
प्रश्न ---अचेल अवस्था या दिगम्बरत्व क्या है ?
उत्तर-विविध धर्मों के साहित्य में जो अचेल या दिगम्बरत्व के पोषक वाक्य मिलते हैं, उसका कारण यह प्रतीत होता है, कि इन समस्त देशों के विद्वानों दिगम्बर अवस्था में जिनेन्द्र देव के अवश्य दर्शन किये थे। प्रचर शीत परिपूर्ण तथा हिमाच्छदित देशों के साहित्य में भी दिगम्बर वृत्ति के प्रति आदरपूर्ण भाव प्रदर्शन का असली रहस्य. यह रहा है कि सभी तीर्थकर मुनि अवस्था में निर्ग्रन्थ थे, श्वेताम्बरों की मान्यतानुसार निग्रंन्यपने का दिगम्बर पन से रहित अर्थ करना असंगत है, क्योंकि वस्त्रों के होते हुये श्रेष्ठ अहिंसा वृत्ति का पालन करना असंभव है । वस्त्रादि के प्रति मुर्छारूप अन्तरंग परिग्रह भाव तो रहेगा ही, साथ ही द्रव्य हिंसा का भी दोष नहीं टाला जा सकता है । वस्त्रों को स्वच्छ करते समय सलत अनन्त जलकायिक जीवों का विनाश भी प्रावश्यम्भावी है। ..
प्रश्नयोग निरोध के बाद समवशरणादि की क्या स्थिति है ?
उत्तर--भगवान आदिनाथ को सिद्धालय प्राप्त करने में जब चौदह दिन शेष रह गये तब प्रभु श्रादिनाथ कैलाशगिरि पर आ गये । कैलाश पर्वत पर प्रभु पद्मासन से विराजमान हुये। जिस दिन योग निरोध कर भगवान. अष्टापद अर्थात् कैलाश पर्वत पर विराजमान हुये, उसी दिन भारत चक्रवर्ती ने स्वप्न में देखा कि
तदाभरतराजेन्द्रो महामंदरभूधरं । . आप्राम्भारं व्यलोकिष्ट स्वप्ने दैर्येण संस्थितं ॥१५४८॥
महा मंदराचल अर्थात् सुमेरु पर्वत वृद्धि को प्राप्त होता हुआ प्रभाकर पृथ्वी अर्थात् सिद्ध लोक तक पहुँच गया है ।
युवराज अर्क कीति ने स्वप्न में देखा, एक महौषधि का वृक्ष स्वर्ग से आया था । मनुष्यों का जन्म-रोग नष्ट कर वह पुनः स्वर्ग में चला गया। गृहपति रत्न ने देखा कि एक कल्पद्रुम स्वर्ग प्राप्ति के लिये समुद्यत है । चक्रवर्ती के प्रमुख मंत्री ने देखा कि एक रत्नों का दीपक जीवों को ज्ञानरत्न देने के पश्चात् आकाश में जाने के : लिये उद्यत हो रहा है । सेनापति ने देखा, कि एक सिंह वज्र के पिंजरे को तोड़कर कैलाश पर्वत को उल्लंघन करने के लिये तैयार हुआ। भरत चक्रवर्ती के पुत्र अर्क . .
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