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अध्याय : आठवां }
! ७०७ कीति ने देखा कि त्रिलोक को प्रकाश करता हुआ तारकेश्वर अर्थात् चन्द्रमा ताराओं सहित जा रहा है, चक्रवर्ती की पट्टरानी सुभद्रा का स्वप्न था कि ऋषभ देव भगवान की रानी यशस्वती और • सुनन्दा के साथ, शक्र अर्थात् इन्द्र की मनः प्रिया अर्थात महादेवी (इन्द्रागी). बहुत कालपर्यन्त शोक कर रही है । इन स्वप्नों का फल पुरोहित ने यह बताया कि ये समस्त स्वप्न यह सूचित करते हैं कि भगवान वृषभ देव समस्त कामों का निर्मूल नाश कर अनेक मुनियों के साथ मोक्ष पधारेंगे ।
इतने में प्रानन्द नाम के व्यक्ति ने चक्रवर्ती भरतेश्वर को भगवान ऋषभ का सर्ववृतांत बताया कि
ध्यनौ भगवतो दिव्ये संहृते मुकुलीभवत् । कराम्बुजा सभा जाता पूष्णीय सरसोत्यसौ ।।१५४६॥
भगवान की दिव्य ध्वनि का खिरना अब बन्द हो गया है, इससे जैसे सूर्य के अस्त के समय सरोवर के कमल मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार सब सभा हाथ जोड़े हुये मुकुलित (उदास) हो रही है।
___ इस समाचार को सुनते ही भरत चक्रवर्ती तत्काल कैलाश पर्वत पर पहुंचे । उन प्रभु की तीन परिक्रमा करके स्तुति की। .. महामहमहापूजां भक्त्या निर्वर्तयन्स्वयं ।
चतु दश दिनान्येवं भगवंत भसेवात ॥१५५०॥
चक्रवर्ती भरत ने महामह नाम की महान पूजा भक्ति भाघ पूर्वक स्वयं की तथा चौदह दिन तक भगवान की सेवा भक्ति की।
यहां यह बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि सर्व सामग्री का सन्निधान होते हुये भी प्रादिनाथ. जिनेन्द्र की लोक कल्याण निमित्त बिरने वाली दिव्यवाणी वन्द हो गई, क्योंकि क्षरण-क्षरण में विशेष विशुद्धता को प्राप्त करने वाले इन प्रभु की शुद्धोपयोग रूप अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित हो गई है और अब उसमें अधातिया को को भी स्याहा (भस्म करने की तैयारी प्रात्म यज्ञ के कत्ल जिनेन्द्र ने की है। प्रारम्भ में निर्दयता पूर्वक पाप कर्मों को नष्ट किया था और अब शुभ भावों द्वारा बांधी गई पुण्य प्रकृतियों का की शुभ भाव रूपी तीक्ष्ण सलवार के द्वारा ध्वंस का कार्य शीघ्र आरम्भ होने वाला है। संसार के जीवों की अपेक्षा प्रिय और पूज्य मानी गई तीर्थंकर प्रकृति अब इन वीतराग प्रभु को सर्वथा क्षय योग्य लगती है, क्योंकि ऐसा कोई