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अध्याय : आठवां ]
जिनेन्द्र देव की वाणी की महिमा का कौन वर्णन कर सकता है ? सम्राट भरत ने भगवान के श्रीमुख से मुनि दीक्षा लेते समय सांत्वना के शब्द सुने थे, उसके पश्चात् अब फिर प्रभु की प्रिय मधुर तथा शांतिदायिनी बारसी सुनने में आई । समवशरण में विद्यमान भव्य जीवों को प्रवर्णनीय आनन्द तथा प्रकाश की उपलब्धि हुई । चिर पिपासित चातक के मुख में मेघ बिन्दु पड़कर जैसी प्रसन्नता उत्पन्न करती है, ऐसी ही प्रसन्नता प्रभु की वाणी को सुनकर, समवशरण के भव्य जीवों को प्राप्त हुई थी। प्रभु की वाणी का सम्राट भरत पर क्या प्रभाव पड़ा ? इस पर महापुराणकार इस प्रकार प्रकाश डालते हैं
ततः सम्यकत्वशुद्धि च व्रतशुद्धि पुष्कलाम् । निष्कलात् भरतो भेजे परमानन्दमुद्रहन् ॥१५४१॥
भगवान की दिव्य देशना को सुनकर सम्राट भरत ने परम आनन्द को प्राप्त होते हुए सम्यक्त्व शुद्धि तथा यतों के विषय में परम विशुद्धता प्राप्त की।
भरत महाराज ने भगवान की अराधना कर सम्यग्दर्शन रूप मुख्य मरिण सहित व्रत और शीलों से समलंकृत निर्मल माला अपने कंठ में धारण की, जो मुक्ति श्री के कंठहार के समान लगती थी। अर्थात् भरत महाराज ने बारह व्रतों द्वारा अपना जीवन अलंकृत किया था । इस कारण वे सम्राट भरत सुसंस्कृत मरिण के समान दैदीप्यान होते थे।
___भगवान की दिव्य वाणी सुनकर बारहवें कोठे में स्थित पशुओं, पक्षियों के मध्य में स्थित मयूरों को बड़ा हर्ष हुआ, क्योंकि जिनेन्द्र की मधुर वाणी उन मयूरों को अत्यन्त प्रिय मेघ की ध्वनि समान सुनाई पड़ी थी। महाकवि जिनसेन स्वामी कहते हैं
दिव्यध्वनिमनुसत्य जलद-स्तनितोपमम् ।। अशोक-विटपारकाः सस्वनु-दिव्यबर्हिगः ॥१५४२॥
मेघ की गर्जना के समान भगवान की दिव्यध्वनि को सुनकर अशोक वृक्ष की शाखाओं पर स्थित दिव्य मयूर भी प्रानन्द से मानों शब्द करने लग गये थे। ।
प्रश्न--ऋषभनाथ तीर्थजूर के प्रथम गणधर वृषभसेन थे क्या ? • उत्तर-~~भगवान की दिव्य देशना से भरत महाराज के छोटे भाई पुरिमसाल पुर. (वर्तमान प्रवाग) के स्वामी वृषभसेंन की आत्मा अत्यधिक प्रभावित हुई । वृषभ