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Emaghwani
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[ गो. प्र. चिन्तामणि प्रभु की प्रदक्षिणा दी । श्रेष्ठ सामग्री से उन देवाधिदेव की अत्यन्त भक्ति पूर्वक पूजा की। पूजा के उपरान्त उनको प्रणाम किया और उनका मंगलास्तवन करते हुए कहा
त्वं शभुः शंभवः शंयुः शंवक्षः शंकरों हरः। .. हरि मोहासुरारिश्च तमोरिभव्यभास्करः ।।१५३८॥
हे भगवान आप ही शम्भु हैं, संभव हैं, शंयु अर्थात् सुखी हैं, शंवद अर्थात् सुख या शान्ति का उपदेश देने वाले हैं, शंकर अर्थात् शांति के करने वाले हैं, हर हैं, मोह रूपी असुर के शत्रु हैं, हरि हैं, अज्ञानरूप अन्धकार के अरि हैं और भव्य जीवों के लिये उत्तम सूर्य हैं।
भरतेश्वर जिनेन्द्र देव के गुणस्तवन के शिवाय नाम कीर्तन को भी प्रात्म निर्मलता का कारण मानले हुए कहते हैं---
तदास्तां ते गुण स्तोत्रं नाम मात्रं च कौतितम् । . पुनाति मस्ततो देव स्वनामोद्देशतः श्रिताः ॥१५३९।।
हे देव ! आपके गुणों का स्तोत्र करना तो दूर रहा, आपका उच्चारण किया हुआ नाम भी हम लोगों को पवित्र कर देता है, अतएव हम आपका नाम लेकर ही अापकी शरण को प्राप्त होते हैं । भरत चक्रवर्ती के निमित्त से भगवान की दिव्य ध्वनि
वृषभात्मज भरतेश्वर जगत् पिता वृषभ जिनेश्वर की स्तुति के उपरान्त श्री मंडप में जाकर अपने योग्य सभा में जा बैठे। पश्चात् विनय पूर्वक भरतराज ने जिनराज की प्रार्थना की
भगवान बोद्ध मिजामि कीदृशस्तत्वविरतरः । मार्गो मार्गफलं चापि कीदृग तत्वविदांवर ॥१५४०।।
हे भगवन् ! तत्त्वों का स्पष्ट स्वरूप किस प्रकार है ? मार्ग तथा मार्ग फल. कैसा है? हे तत्त्वज्ञों में श्रेष्ठ देव ! मैं आपसे यह सब सुनना चाहता हूँ।
भाग्यशाली भक्त भव्य शिरोमणी भरतराज के प्रश्न के उत्तर में भगवान ने समस्त सप्त लत्वों का, रत्नत्रम मार्ग तथा उसके फलस्वरूप निर्वाण प्रादि का अपनी दिव्य वाणी के द्वारा निरूपण किया। सर्वज्ञ, वीतराग तथा परम हितोपदेशी