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श्रध्याय आठवां 1
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है। उससे सर्व प्रकार की कठिनताएँ सहज ही सुलझ जायेगी । जिस प्रकार वैशाख सुदी दशमी को महावीर भगवान को केवलज्ञान हो जाने पर ६६ दिन तक दिव्यध्वनि उत्पन्न नहीं हुई थी, यद्यपि सर्व सामग्री का समुदाय वहाँ विद्यमान था । जय धवला टीका में कहा है कि उस समय गरणधर देवरूप कारण का प्रभाव था, 'गरिशाभावादी' (१० ७६) ।
द्वारा केवल्य ज्ञान लक्ष्मी
गरधर देव की उपलब्धि होने पर श्रावण कृष्ण प्रतिपदा को प्रभात बेला में वीर जिनेन्द्र की दिव्य ध्वनि खिरी थी । इससे भी कठिन परिस्थिति उस कर्म भूमि के प्रारम्भ काल में थी, जब भगवान यादिनाथ ने तपश्चर्या प्राप्त की थी । यदि लोक धर्म तत्व के ज्ञाता होते तो मुनि छह माह तक आहार प्राप्ति के निमित्त क्यों भटकना पड़ता स्थिति मन में विविध शंकाओं को उत्पन्न करती है ।
अवस्था में भगवान को ? इस प्रकार की कठिन
यह
महापुराणकार कहते हैं कि भरत महाराज को धर्माधिकारी पुरुष समाचार प्राप्त हुआ कि आदिनाथ भगवान को केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ है, आयुध शाला के रक्षक से ज्ञात हुआ कि प्रायुध शाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ है तथा कंचुकी से ज्ञात हुआ कि राज भवन में पुत्र उत्पन्न हुआ है ।
धर्मास्थाद् गुरुकैवल्यं चक्रमायुधपालतः ।
गुरोः कैवल्यसंभूति सूति च सुतचक्रयोः । ११५३७।।
भरतेश्वर ने पहले धर्म पुरुषार्थ की आराधना करना कल्याणदायी सोच, 'कार्येषु प्राविधेयं तद्धयं श्रेयनुबंधि यत् । (८) इससे भरत महाराज सपरिवार पुरिमतालपुर जाने को उद्यत हुये । तिलोयपति में लिखा है कि फाल्गुण कृष्ण एकादशी के पूर्वान्ह काल मे उत्तराषाढ़ नक्षत्र के रहते हुये प्रादिनाथ भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ था ( ४-६७६ ) प्रभु के समवशरण की भूमि सूर्य मंडल के समान गोल इन्द्रनील मणिमयी तथा बारह योजन प्रमाण विस्तार वाली थी । केवल ज्ञान उत्पन्न होते ही भगवान का परम श्रदारिक शरीर पृथ्वी से पांच हजार धनुष ऊंचाई पर चला गया था । भरत महाराज ने सुवर्ण निर्मित बीस हजार सीढ़ियों पर से शीघ्र ही समवशरण में प्रवेश किया था ।
पुण्यशाली महाराज भरत ने पद्मासन से विराजमान उन अन्तरयामी श्रादिनाथ