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[ गो. प्र. मिन्तामणि निग्रंथो नीरजो बीतविघ्नों विश्वकबांधवः । केवलज्ञान साम्राज्यधिया शान्तिमशिनियत् ॥१५३३॥
धर्म शर्माभ्युदय में लिखा है कि धर्मनाथ तीर्थंकर समवशरण में बैठे हुये थे। कहा भी है...
रत्नज्योतिर्भासुरे तत्र पोठे तिष्ठन् देवः शुभ्रभामंडलस्थः । क्षीरांभोधेः सिच्यमानः पयोभिभूयोरेज कांचनावाविवोच्चैः ॥१५३६॥
तिलोयपरणत्ति के उपरोक्त कथन के प्रकाश में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि धर्मनाथ, शान्तिनाथ तथा महावीर भगवान का मोक्ष कायोत्सर्ग आसन से हुआ है, किन्तु समवशरण में बे पद्मासन से विराजमान रहते थे। अतएव केवलज्ञान होने पर समवशरण में तीर्थंकर भगवान को पभासन मुद्रा में विराजमान मानना उचित है । सिंहासन रूप प्रातिहार्य अहंत भगवान के पाया जाता है। उस पर कायोत्सर्ग आसन से रहने की कल्पना उचित नहीं दिखती है ।
एक बात यह भी विचारणीय है कि द्वादश सभाओं में समस्त जीव बैठे रहे, और भगवान खड़े रहे, ऐसा माने पर भक्त भव्य जीवों पर अविनय का दोष श्राये बिना न रहेगा। तीन लोक के नाथ खड़े रहें उनके चरणों के सेवक जीव बैठे
ज्ञानार्णव में पिंडस्थ ध्यान के प्रकरण में सिंहासन पर पद्मासन से विराजमान जिनेन्द्र देव चितवन करने का कथन पाया है। अतः यह बात आगम तथा युक्ति के अनुकूल है कि समवशरण में भगवान सिंहासन पर पभासन से विराजमान रहते हैं। बिहार में कार्योत्सर्ग आसन होता है । उसके पश्चात पद्मासन हो जाता है । आसन में परिवर्तन मानने में कोई बाधा नहीं है। . ऋषभनाथ तीर्थकर प्रभु की दिव्यध्वनि गणधर का प्रभाव---
__भगवान ऋषभदेव को जब केवलज्ञान प्राप्त हुआ था, तब उनके उपदेश के पूर्व साधारण लोग धर्म तत्व से पूर्ण अपरिचित थे, अंतः समवशरण के निर्माण होने पर भी मगधर कौन बनेगा और कौन भगवान की दिव्यध्वनि को झेलेगा । कर्म भूमि के प्रारम्भ की अवस्था को दृष्टि में रखने वाले के समक्ष सम्पूर्ण परिस्थिति का चित्र उपस्थित हो जायेगा । इस प्रसंग में महापुराण से एक महत्वपूर्ण प्रकाश प्राप्त होता