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________________ अध्याय आठवां ] f ६६& ठासेज्जविहार धम्मुवदेसो हि शियदयो तेसि । अरहंताणं काले मायाकारोव इच्छी ।।१५३१॥ अरहन्त भगवान के केवली अवस्था में खड़े होना, पद्मासन से बैठना, विहार करना तथा धर्मोपदेश देना ये सब कार्य स्वभाव से ही पाये जाते हैं। जिस प्रकार स्त्रियों में मायापरिणाम स्वभाव से होता है । जिस प्रकार जिनेन्द्र देव की दिव्य देशना इच्छा के बिना होती है, उसी प्रकार उनके शरीर में खड़े रहना, बैठना तथा विहार करना आदि कार्य भी इच्छा के बिना ही होते हैं । प्रश्न :-- समवशरण में बिहार के पश्चात् श्ररहन्त भगवान खड्गासन में रहते हैं या उनके पद्मासन हो जाता है ? उत्तर :- बिहार के पश्चात् समवशरण में भगवान अरहन्त पद्मासन से विराजमान रहते हैं । हरिवंशपुराण में लिखा है कि महावीर भगवान के दर्शनार्थ चतुरंग सेना समन्वित सम्राट श्रेणिक ने सिंहासन पर विराजमान वीर भगवान के दर्शन कर उनको प्रमाण किया था । श्लोक में 'सिंहासनोपविष्ट' शब्द का अर्थ है सिहासन पर बैठे हुये । मूल श्लोक इस प्रकार है सिंहासनोपविष्टं सं सेनया चतुरंगया। श्रेणिकोऽपि च संप्राप्तः प्राणनाम जिनेश्वरम् ।। १५३२ ।। इस प्रकरण में यह बात ज्ञातव्य है कि वीर भगवान ने कायोत्सर्ग आसन से मोक्ष प्राप्त किया है । तिलोयपष्पति में लिखा है- उसहोय वासुपूज्जों पेमी पल्लंकबद्धया सिद्धा । errea जरा सेसा मुति सभावा ।। १५३३।। ऋषभनाथ भगवात, वासुपूज्य स्वामी तथा नेमिनाथ भगवान ने पत्यंक ब आसन से मोक्ष प्राप्त किया है । शान्तिनाथ पुराण में लिखा है कि समवशरण में शान्तिनाथ भगवान का पत्यकासन था । कहा भी है श्र ेष्ठषष्ठो पचासेन धवले दशमीदिने । पौषमास दिनस्यान्ते पत्यंकासनमास्थितः ।। १५३४।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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