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________________ [गो. प्र. चिन्तामणि परमानंताव्याबाध रूपेणव तेषां च तत्र वृत्तिः केवलज्ञानरूपेरणानंतवीर्यवत्'--उक्त रूप से अभयदानादि के लिये शरीर नाम कर्म के उदय की अपेक्षा पड़ती है। सिद्ध भगवान के शरीर नाम कर्म के उदय का प्रभाव होने से उक्त प्रकार की अपेक्षा पड़ती है। सिद्ध भगवान के शरीर नाम कर्म के उदय का अभाव होने से उक्त प्रकार के अभयदानादि का प्रसंग नहीं आयेगा । जिस प्रकार केवलझान रूप से उन सिद्धों में अनन्त वीर्य गुण माना जाता है अर्थात् अनन्त वीर्य के साथ केवलज्ञान का अविनाभाव सम्बन्ध होने से केवलज्ञान होने से अनन्तवीर्य का सदभाव सिद्ध होता है, उसी प्रकार उक्त अभयदानादि भावों का समावेश करना चाहिये। . . प्रात्मा में अनन्त शक्ति है जो वीर्यान्तराय कर्म के क्षय से उत्पन्न होती है । यह शक्ति प्रात्मा कि स्तुति नहीं है, किन्तु वास्तव में युक्ति द्वारा यह शक्ति सिद्ध होती है। पं. आशाधरजी ने सागरधर्मामत में लिखा है कि आत्मा में अनन्त शक्ति का सद्भाव मानना अतिशयोक्ति नहीं है, किन्तु यह वास्तविक है। प्राचार्य कल्प पं. प्राशायरी का प्रजिताय सह है कि जगत गर में सुर, नर, पशु, देव, दानव आदि तथा अन्य सम्प्रदायों में पूज्य माने गये उनके भगवान आदि भी कामवासना के कारण स्त्री का परित्याग करने में असमर्थ हैं। इतना प्रभाव इस काम भाव का है, जिसका स्वानुभव में निमग्न जिन भगवान ने जड़मल से नाश कर दिया है, अतएव अनन्त जीवों पर शासन करने वाले काम के विध्वंसक जिनेन्द्र देव में अनन्त वीर्य का सद्भाव मानना पूर्णतया युक्ति संगत है । प्रश्न :--समवशरण में तीर्थंकर प्रभु का कौनसा पासन रहता है ? उत्तर:- समवशरण में तीर्थंकर प्रभु का प्रासन पद्यासन रहता है। प्रश्न :--भगवान भव्य जीवों के संताप दूर करने के लिए जो विहार करते . हैं, उस समय उनके पैरों को उठाकर डग भरते हुये गमन को देखकर ऐसा प्रतीत सोता हैं कि भगवान के इस प्रकार की क्रिया का सद्भाव स्वीकार करना इच्छा अस्तित्व का संदेह उत्पन्न करना है। तो वास्तव में क्या है ? उत्तर :--मोहनीय कर्म का अत्यन्त क्षय हो जाने से जिनेन्द्र भगवान के इच्छा का पूर्णतया प्रभाव हो चुका है, फिर भी उनके शरीर में जो क्रिया होती है, वह अबुद्धि पूर्वक स्वभाव से होती है। प्रवचनसार में कुन्द-कुन्द प्राचार्य ने लिखा है----
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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