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अध्याय : आठवां ] प्रभु की दृष्टि कर्माधीन सुख की ओर से पूर्ण विमुख है।
राजवातिक में लिखा है-'सम्पूर्ण भोगांतराय के तिरोभाव हो जाने से अतिशयों का अविर्भाव होने से भगवान के क्षायिक अनन्त भोग होता है। इसके फल स्वरूप पंचवर्ण युक्त सुगन्धित पुष्पों की वर्षा चरणों के निक्षेप के स्थान में अनेक प्रकार की दिव्य गंध युक्त सात कमलों की पंक्ति, सुगन्धित धूप, सुखद और शीतल पवनादिक प्राप्त होते हैं । कृत्स्नस्य भोगांतरायस्य तिरोभावादाविर्भूतोऽतिशयवाननंतो भोगः क्षायिको, यत्कृताः पंचवर्ण सुरभि कुसुमवृष्टि विवध, दिव्य गंध चरण निक्षेप स्थान सप्तपद्मपंक्ति सुगंधित धूप सुख शीतमारुतादयो भावाः ।'
- क्षायिक उपभोग के विषय में प्राचार्य का कथन है परिपूर्ण रूप से उपभोगान्तराय कर्म के नाश होने से उत्पन्न होने वाला अनन्त उपभोग क्षायिक है । इसके कारण सिंहासन, बाल व्यजन (पंखा) अशोक वृक्ष, छत्रत्रय, प्रभा मंडल, गम्भीर तथा मधुर स्वर रूप परिणमन होने वाली देव दुन्दुभि आदि पदार्थ होते हैं, 'निरबशेषस्योपभोगान्तराय कर्मणः प्रलयात्प्रादुभूतोऽनंत उपभोगः क्षायिको, यत्कृताः सिंहासन-बाल व्यजन अशोकपादप-क्षत्रत्रय-प्रभामण्डल-गम्भीर-स्निग्ध स्वर परिणाम-देवदुन्दुभिप्रभृतयो भावाः (पृ०७३)
- भगवान के द्वारा दिए जाने वाले क्षायिक दान पर अकलंक स्वामी इस प्रकार प्रकाश डालते हैं दानान्तराय कर्म के अत्यन्त क्षय होने से उत्पन्न होने वाला त्रिकाल गोचर अनन्त प्रारणी मात्र का अनुग्रह करने वाला क्षायिक अभय दान होता हैं । 'दानान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्त संक्षयादाविर्भूतं त्रिकालगोचरानन्त-प्रारिणगणानुरह करं क्षायिकमभयदान (पृ० ७३) . . जिनेन्द्र भगवान के कारण अनंत जीवों को कल्याणदायी तथा अविनाशी सुख का कारण अभयदान प्राप्त होता है, उसकी तुलना संसार में नहीं की जा सकती है । अन्य दोनों का सम्बन्ध शरीर तक ही सीमित है । यह वीतराग प्रभु का दान आत्मा को अनंत दुःख से निकालकर अविनाशी उत्तम सुख में स्थापित करता है । यह सामर्थ्य अलौकिक है।
प्रश्न :--सिद्ध भगवान में अभयदानादिक का सद्भाव कसे सिद्ध होगा ?
: उत्तर :-उक्त दानादि का सिद्धों में कैसे सद्भाव सिद्ध होगा? इस प्रश्न के उत्तर में अकलंक स्वामी कहते हैं 'शरीरनामकर्योदयाद्यपेक्षत्वात्तेषां तद्भावे तदप्रसंगः