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________________ Ramaee E अध्याय : पहला . .... ... [३ उपघात, परघात, गुरुलघु, उच्छवास, प्रातप, उद्योत, प्रशस्तविहायो गति, प्रत्येक, बस, पर्याप्त, बादर, शुभ, स्थिर, सुस्वर, सुभग, मादेय, यशःकीति, अप्रशस्त विहायोगति, साधारण, स्थावर, अपर्याप्त, सूक्ष्म, अशुभ, अस्थिर, दुःस्वर, दुर्भग, अनादेय, अयश:क्रीति, तीर्थकर, इस प्रकार १३ प्रकृति नाम कर्म की होती हैं। प्रश्न :-गोत्रकर्म के दो भेद कौनसे हैं ? उत्तर :—गोत्रकर्म के दो भेद हैं-१ उच्चगोत्र, २. नीचगोत्र । प्रश्न :- अन्तरायकर्म के ५ भेद कौनसे हैं ? उत्तर :-१ दानान्तराय, २ लाभान्तराय, ३ भोगान्तराय, ४ उपभोगान्त राय, ५ बीर्यान्तराय । इस प्रकार ५. भेद अन्तराय कर्म के हैं । कर्मों के भेद-प्रभेदों के पश्चात् उनके स्वरूप बताते हैं । :-ज्ञानावरण कर्म किसे कहते है ? उत्तर :--जिस कर्म के उदय से प्रात्मा के ज्ञान गुण का घात होता है और ज्ञान प्रगट नहीं होता, मात्मा के ज्ञान गुरण पर जिसका अवगुण्ठन होता है, उसे ज्ञानावरण कम कहते हैं । ज्ञानावरण के ५ प्रभेदों का स्वरूप निम्न प्रकार से है । प्रश्न :- मतिज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-~जो कर्म मतिज्ञान न होने दे अथवा जिस कर्म के उदय से मतिज्ञान की प्राप्ति न हो, उसे मतिज्ञानावरण कर्म कहते हैं। प्रश्न :--श्र तज्ञानाचरण कर्म किसे कहते हैं. ?. . उत्तर :--जिस कर्म के उदय से श्रुतज्ञान की प्राप्ति न हो, उसे श्रुतज्ञानावरण कर्म कहते हैं । प्रश्न :--प्रवधिज्ञानावररय कर्म किसे कहते हैं ? उत्तर :-इस कर्म के उदय से जीव को अबधिज्ञान नहीं होता है अर्थात् जो कर्म . अवधिज्ञान को नहीं होने दे, उसको अवधिज्ञानावरण कर्म कहते हैं। :--मनःपर्ययज्ञानावरण कर्म किसे कहते हैं ? m'. ::: ... : : या ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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