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________________ अध्याय : सातवां ] बलि-जो पति के समान देदीप्यान हो, उसे वह्नि कहते हैं। अरुण---उदीयमान सूर्य के समान जिनकी कान्ति हो, वे अंग कहलाते हैं । गर्दतोय-शब्द को गर्द और जल को तोय कहते हैं। जिनके मुख से शब्द जल के प्रवाह की तरह निकलें, वे गईटीय कहते हैं । तुषित--जो संतुष्ट और विषय सुख से परान्मुखं रहते हैं, वे तुषित हैं। अव्याबाध-जिनके कामादिजनित बाधा नहीं है, वे अव्यांबाथ हैं। अरिष्ट-- जो अकल्याणकारी कार्य नहीं करते हैं, उनको अरिष्ट कहते हैं। . सारस्वत सादि देवों के विमान क्रमशः ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिरण नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा में हैं। इनके अन्तराल में भी दो-दो देवों के विमान हैं । सारस्वत और आदित्य के अन्तराल में अग्न्याभ और सूर्याभ, आदित्य और वह्नि के अन्तराल में चन्द्राभ और सत्याभ, वह्नि और अरुण के अन्तराल. में श्रेयस्कर और क्षेमकर, अरुण और गर्दतोय के अन्तराल में वृषभेष्ट और कामचर, गर्दतोयं और तुषित के मध्य में निर्माण रज और दिगन्तरक्षित, तुषित और अव्याबाध के मध्य में ग्रात्मरक्षित और सर्वरक्षित, अव्यांदाध और अरिष्ट के मध्य में मस्त और वसु और अंरिष्ट और सारस्वत के मध्य में अपूर्व और विश्व रहते हैं । ___ सब लौकान्तिक स्वाधीन, विषय सुख से परान्मुख, चौदह पूर्व के ज्ञाता और देवों से पूज्य होते हैं । ये देव तीर्थकरों के तप कल्याण में ही आते हैं । __ लोकान्तिक देवों की संख्या चार लाख सात हजार पाठ सौ बीस है। विजय आदि विमानवासी देवों की संसार की अवधि विजयादिषु द्विचरमाः ॥१२२३॥ विजय, वैजयन्त और अपराजित विमानवासी अहमिन्द्र मनुष्य के दो भव धारणा कर नियम से मोक्ष चले जाते हैं। यहां मनुष्य भव की अपेक्षा से इनको द्विचरम कहा है। कोई भी अहमिन्द्र विजयादि से च्युत होकर मनुष्य गति में आयेगा । पुनः वह मनुष्य भव समाप्त कर विजयादि में ही उत्पन्न होगा । फिर निंजयादि से ध्युत होकर मनुष्य भवं धारण कर नियम से मोक्ष चला जायेगा, इस प्रकार मनुष्य भव की अपेक्षा दो भव और मनुष्य भव में देवपर्याय को भी मिला देने से दो मनुष्य भव और एक देव भव इस प्रकार विजय प्रादि में उत्पन्न होने वाले अहमिन्द्रों के तीन भव और बाकी रह जाते हैं। लेकिन सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र एक भवावतारी होते
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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