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________________ - --- _MAurannic.unuineamar a MA THEAasmanakaram.my-muAYamimeramanandnaNAIDUNIAध्य म ५२८ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण हैं ! मनुष्य का एक भल धारगा करके ही मोक्ष चले जाते हैं। .... तिर्यञ्चों का वर्णन---- प्रौपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ।।१२२४॥ उपपाद जन्म बाले देव और नारकी तथा मनुष्यों को छोड़कर शेष समस्त संसारी जीव तिर्यञ्च हैं । तिर्यञ्च सम्पूर्ण लोक में व्याप्त हैं। भवनवासी देवों की उत्कृष्ट प्रायुस्थितिरसुरनागसुपर्ण द्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमा हीन मिताः ॥१२२॥ भवनवासी देवों में असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और शेष के छह कुमारों की उत्कृष्ट प्रायु कम से एक सागर, तीन पल्य, अढ़ाई पल्य, दो पल्य, डेढ़ पल्य है। वैमानिक देवों की उत्कृष्ट प्रायु सौधर्मेशानयोः सागरोपमे अधिके ॥१२२६॥ . सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट प्रायु कुछ अधिक दो सागर है । 'अधिके' इस शब्द को अनुवृत्ति सहस्त्रार स्वर्ग पर्यन्त होती है । इसलिये सहस्त्रार तक के देवों की आयु कथित सागरों से कुछ अधिक होती है । . सौधर्म और ऐशान स्वर्ग के पटलों में प्रायु का वर्णन प्रथम पटल में ६६६६६६६ करोड़ पंल्य और इतने ही पल्य तथा पल्य के तीन विभागों में से दो भाग उत्कृष्ट प्रायु है । .. दूसरे पटल में १३३३३३३३ करोड पल्य.तथा ३३३३३३३ पल्य और पल्य के तीन भागों में से एक भाग प्रायु है। तीसरे पटल में दो कोड़ा-कोड़ी पल्य की श्रायु है । चौथे पटल में २६६६६६६६ करोड़ पल्य तथा ६६६६६६६ पल्य और पल्य के तीन भागों में से दो भाग प्रमाण प्रायु है । पांचवें पटल में ३३३३३३३ करोड़ पल्य तथा ३३३३३३३ पत्य और पल्य के तीन भागों में से एक भाग प्रमाण आयु है। छठवें पटल में बार कोड़ा-कोड़ी पल्य की प्रायु है । . सातवें पटल में ४६६६६६६६ करोड़ पल्य तथा ६६६६६६६ पल्य और
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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