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[ गो. प्र. चिन्तामणि में मिश्र-पीत और पद्म लेश्या होती है । लकिन पद्म श्या की विवक्षा न करके सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्ग में पीत लेश्या ही कही गई है। ब्रह्म से लान्तव स्वर्गपर्यन्त पा लेश्या और शुक्र से सहस्त्रार स्वर्ग पर्यन्त मिश्र-पद्म और शुक्ल लेश्या होती है, लेकिन शुक्र और महाशुक्र में शुक्ल लेश्या की विवक्षा न करके पद्म लेश्या ही कही गई है। इसी प्रकार शतार और सहस्त्रार स्वर्ग में पक्ष लेश्या को विवक्षा न करके शुक्ल लेश्या हो सूत्र में कही गई है । कल्प को सीमा
प्राग्न धेयकेभ्यः कल्पः ११२२०॥
त्रेयकों से पहिले के विमानों की कल्प संज्ञा है । अर्थात् सोलह स्वर्गो को कल्प कहते हैं । न ग्रेवेयक, नव अनुदिश और पांच अनुत्तर विमान करूपातीत कहलाते हैं। लौकान्तिक देवों का निवास--
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ।१२२॥ लौकान्तिक देव ब्रह्मलोक नामक पांचवें स्वर्ग में रहते हैं ।
प्रश्न- यदि ब्रह्मलोक में रहने के कारण इनको लोकान्तिक कहते हैं, तो ब्रह्मनिवासी सब देवों को लौकान्तिक कहना चाहिये ?
उत्तर--लौकान्तिक यह यथार्थ नाम है और इसका प्रयोग ब्रह्मलोक निवासी राब देवों के लिये नहीं हो सकता । लोक का अर्थ है ब्रह्मलोक के अन्त को लोकान्त और लोकान्त में रहने वाले देवों का नाम लोकान्तिक हैं । अथवा संसार को लोक कहते हैं । और जिनके संसार का अन्त समीप है, उन को लौकान्तिक कहते हैं । लोकान्तिक स्वर्ग से च्युत होकर मनुष्य भव धारण कर मुक्त हो जाते हैं। अतः लौकान्तिक यह नाम सार्थक है । लौकान्तिक देवों के भेद----
सारस्वतादित्य बह्नमरण गर्दतोयतुषिता व्याबाधारिष्टाश्च ॥१२२२॥
सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध, अरिष्ट ये आठ प्रकार के लोकान्तिक देव होते हैं ।
सारस्वत--जो चौदह पूर्व के ज्ञाता हों, वे सारस्वत कहलाते हैं । मादित्य- देवमाता अदिति की संतान को प्रादित्य कहते हैं ।
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