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________________ अध्याय : प्राठवां ] [ ७१६ हरिवंशपुराण में यह भी कहा है ऊर्जयंतगिरौ वज्री बरपालिख्यपावनां । लोके सिद्धि शिला चक्क जिमलक्षणालंकृतां ॥१५७४।। गिरनार पर्वत पर इन्द्र ने परम पवित्र 'सिद्ध शिला' निर्मापी (रची) तथा उसमें जिनेन्द्र के चिन्ह वच द्वारा अंकित किये। स्वामी संमंत भद्र ने स्वयंभू स्तोत्र में भी यह बात कही है कि गिरनार पर्वत पर इन्द्र के निर्वाण प्राप्त जिनेन्द्र नेमिनाथ के चिन्ह अंकित किये थे। यहां हरिवंश पुराग से यह बात विशेष ज्ञात होती है कि इन्द्र एक विशेष शिला-सिद्ध की रचना करके उस पर जिनेन्द्र के निर्वाण सूचक चिन्हों का निर्माण करता है। परम्परा से प्राप्त चरण-चिन्हों को निरिह भूमि में अवस्थिति देखने से यह अनुमान किया जा सकता है कि इन्द्र ने मुक्ति प्राप्त करने वाले भगवान के स्मारक रूप में चरण चिन्हों की स्थापना का कार्य किया होगा । सिद्ध भट्टारक किस को कहते हैं . भगवान जिनेन्द्र ने समस्त कर्मों का नाश करके असिद्धत्वरूप प्रौदयिक भाव से रहित सिद्ध पर्याय को मुक्त होने पर प्राप्त किया है । प्रयोग केवली की अवस्था में भी असिद्धत्व भाव था। राजवातिक में कहा है, 'कर्मोदय-सामान्यापेक्षा, प्रसिद्धः । सयोग केवल्य योग केवलिनोरघातिकर्मोदयापेक्षः' (पृ०७६) । कर्मोदय सामान्य की अपेक्षा से यह असिद्धत्वभाव होता है । सयोग केवली तथा प्रयोग केवली के भी अधातिया कर्मोदय की अपेक्षा यह असिद्धत्व भाव माना सम्पूर्ण जगत को पुरुषाकृति के समान माना जाता है, उसमें सिद्ध परमेष्ठी को त्रिभुवन के मस्तक पर अवस्थित मुकुट समान कहा है । कहा भी है, "तिहुयण-सिर सेहरया सिद्धा भडारया पसीयंतु' त्रिलोक के शिखर पर मुकुट समान विराजमान सिद्ध भट्टारक प्रसन्न होवें । (धवला टीका वेदना खण्ड) अष्टमभूमि अतन्तानन्त सिद्ध भगवानों ने ध्र.क, अचल तथा अनुपम गति को प्राप्त कर जिस स्थान को अपने चिर निवास योग्य बनाया है, उसके विषय में तिलोयपण्यत्ति में
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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