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[ गो. प्र. चिन्तामणि शरीर का दाह संस्कार किया । गणधरों की भी पूजा भक्ति करने के पश्चात् कल्पवासी, ज्योतिषी, व्यन्तर तथा भवनवासी देव अपने-अपने स्थान चले गये ।
अशग कविकृत वर्धमान चारित्र में भी भगवान महावीर के अन्तिम शरीर के दाह संस्कार का इस प्रकार कथन आया है
अग्नीद्रमौलिवररत्नविनिर्गतेनौ । कपूर-लोह-हरिचन्दन सारकाष्ठः ॥ संक्षुभिते सपदि वातकुमार नाथः ।। इन्द्रा मुद्रा जिनपते जयः शरीरं ॥१५७०॥
अग्निकुमारों के इन्द्रों के मुकुट के उत्कृष्ट रत्न से उत्पन्न अग्नि, जो कपूर, लोभान, हरिचन्दन, देवदारु आदि साररूप काष्ठों से तथा वायुकुमारों के इन्द्रों द्वारा शीघ्र ही प्रज्वलित की गई थी, उस अग्नि में इन्द्रों ने प्रभु महावीर के शरीर का सहर्ष दाह संस्कार किया।
हरिवंशपुराण में नेमिनाथ भगवान के परिनिर्वाण पर की गई पूजादि का भी इस प्रकार कथन किया गया है---
परिनिर्वाण कल्याणपूजामत्य शरीरमाम् । चतुर्विधसुराः जैनों चकः शक्रपुरोगमाः ॥१५७१॥
जब नेमिनाथ का निर्वाण हो चुका, तब इन्द्र और चारों प्रकार के देवों ने. जिनेन्द्र देव के अंतिम शरीर सम्बन्धी निर्वाण कल्याणक की पूजा की। : गंध-पुष्पादिभिदिव्यैः पूजितास्तनवः क्षणात् ।
जिनस्य द्योतयंत्यो द्यां विलीना विधु तो यथा ॥१५७२३॥
जिस प्रकार विद्युत देखते-देखते शीघ्र विलय को प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार गन्ध, पुष्पादि दिव्य पदार्थों से पूजित भगवान का शरीर क्षण भर में दृष्टि के अगोचर हो गया।
स्वभावोऽयं जिनादीनां शरीरपरमाणवः ।
मुंचति स्कंधतामते क्षरणास् क्षरणरूचामिव ।।१५७३।। . यह स्वभाव है. कि जिन भगवाल के शरीर के परमाणु अन्त समय में स्कंधः' रूपता का परित्याग करते हैं और बिजली के समान तत्काल विलय को प्राप्त होते हैं । . . . . . . .