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अध्याय : आठवां ।
तदनन्तर देवों तथा देवेन्द्रों ने भक्ति पूर्वक पंचकल्याणक प्राप्त जिनेन्द्र के देहदाह से उत्पन्न भस्म को लेकर हम भी ऐसे हों यही विचार करते हुये, उस भस्म को अपने मस्तक, भुजा बुगल, कंठ तथा छाती में लगाई। उन्होंने उस भस्म को अत्यन्त पवित्र मानी । तथा धर्म के रस में वे देव इन्द्र निमग्न हो गये।
जिनेन्द्र भगवान ने सचमुच में मृत्यु के कारण रूप प्रायु कर्म का क्षय करके अन्वर्थ रूप में समर पद प्राप्त किया है। देवतानों को मृत्यु के वशीभूत होते हुमे भी . नाम निक्षेप से अमर कहते हैं। इसी से उन अमरों तथा उनके इन्द्रों में भस्म को अपने अंगों में लगाकर यह भावना की कि हम नार के अमर न रहकर सचमुच में ऋषभ नाथ भगवान के समान अमर होवे ।
देवेन्द्रादि के द्वारा कृत निवारण कल्याण की लोकोत्तर पूजा को 'अंत्येष्टि' संस्कार कहते हैं। अन्य लोगों में मरण प्राप्त व्यक्तियों के देह दाह को 'अंत्येष्टि' क्रिया कहने की पद्धति पाई जाती है । इस अर्थ शून्य शब्द का अन्य सम्प्रदायों में प्रयोग जैन धर्म के प्रभाव को सूचित करता है । निवारा कल्याणक में शरीर की प्रतिम पूजा अग्नि संस्कार प्रादि की महत्ता स्वतः सिद्ध है, किन्तु पशु-पक्षियों की भांति मरने वालों के शरीर की पूजा की कल्पना करना विवेक-हीनता का परिणाम है।
महावीर भगवान का पावानगर के उद्यान से कायोत्सर्ग आसन से मोक्ष होने परं देवों द्वारा कैलाश गिरि पर किए गए प्रभु के शरीरं संस्कार के सदृश पावानगर के उद्यान में भगवान महावीर के शरीर का दाह संस्कार सम्पन्न हुआ था। पूज्यपाद स्वामी ने निर्वाण भक्ति में लिखा है
परिनित जिनेन्द्र ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य । . . . . . देवतरु-रक्तचन्दन कालागरु-सुरभि-गोशीः ॥१५६८।। अग्नीन्द्राग्जिनदेहं मुकुटानल-सुरभिधूप-वरमाल्यः । अभ्यर्थ गणधरानपि गताविवं स्वं च वनभवनाः ॥१५६६।।
महावीर भगवान के मोक्ष कल्याणाक का संवाद अवगत कर देव लोग शीघ्र ही पावानगर के उद्यान में आये। उन्होंने जिनेश्वर के देह की पूजा की। तथा देवदारु, रक्तचन्दन, कृष्णगरु सुगन्धित गोशीरचन्दन के द्वारा और अग्निकुमार देवों के इन्द्र के मुकुट से उत्पन्न अग्नि तथा सुगन्धित धूप तथा श्रेष्ठ पुष्पों द्वारा भगवान महावीर के