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________________ ७१६ ] शरीरं भर्तु रस्येति परार्ध्य-शिविकापिकलं । . अग्नीन्वं रत्न- भासि-प्रोत ग-मुकुटोद्भवेन ॥ १५६१॥ चन्दनागुरु- कर्पूर-पारी-काश्मीरजादिभिः। घृत क्षीरादिभिश्वाप्तवृद्धिना हय्यभोजिना ।।१५६२॥ जगद्त्रयस्य सौगन्ध्यं संपाद्याभूतपूर्वकं । तदाकारोपमर्देन पर्यायान्तरमानयन् ।। १५.६३।। [ गो. प्र. चिन्तामणि उस समय निर्वाण कल्याण की पूजा की इच्छा करते हुये सब देव वहां स्वर्ग से आये । उन्होंने पवित्र, उत्कृष्ट, मोक्ष के साधन, स्वच्छ तथा निर्मल भगवान के शरीर को उत्कृष्ट मूल्यवाली पालकी में विराजमान किया । तदन्तर अग्निकुमार नाम के भवनवासी देवों के इन्द्र के रत्नों की कांति से देदीप्यमान अत्यन्त उत्कृष्ट मुकुट से उत्पन्न की गई, चन्दन, अगर, कपूर, केशरादि सुगन्धित पदार्थों से तथा घृत, क्षीरादि के द्वारा वृद्धि को प्राप्त अग्नि से त्रिभुवन में अभूतपूर्व सुगन्ध की व्याप्त करते हुये उस प्रभु के शरीर को अग्नि संस्कार द्वारा भस्मरूप पर्यायान्तर को प्राप्त करा दिया ! चिताग्निकुण्डस्य तस्यदक्षिणग्भागेऽभूद्गराभूतः पुष्पादिभिस्तथा । संस्क्रियानलः ।।१५६४॥ तस्यापरस्मिन् दिग्भागे शेष - केवल कायमः । एवं वन्हित्रयं भूभाववस्थाप्यामरेश्वराः ॥ १५६५॥ देवों ने गन्ध, पुष्पादि द्रव्यों से उस अग्निकुण्ड की पूजा की । उस अग्नि कुन्ड के दाहिनी ओर गणधर देवों की अंतिम संस्कार वाली गावरानि स्थापित की केवलियों की अंतिम संस्कार वाली प्रति पृथ्वी पर तीन प्रकार की प्रतियों की और उस अग्नि कुण्ड के बायें भाग में शेष की स्थापना की। इस प्रकार देवेन्द्रों ने स्थापना की । aateen समादाय पंचकल्याणभागिनः । वयं चैवं भवामेति स्वललाटे भुजये ।।१५६६॥ कण्ठे हृदय देशे च तेन संस्पृश्य भक्तितः । तपवित्रतमं मत्वा धर्मराग- रसाहिताः ।। १५६७।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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