________________
अध्याय आठवा ]
[ ७१५
उत्तर-- तीर्थकरों की अनुपम सामर्थ्य की कल्पना करना शक्य नहीं है, फिर भी स्थूल दृष्टान्स द्वारा समझाते हैं, सब पशु समूह में सबसे बड़ा बलशाली प्राणी हाथी है, ऐसा लोग समझते हैं, परन्तु हजारों हाथियों का बल एक सिंह में होता है, और हजारों सिंहों का बल एक शरभ ( शार्दूल ) में होता है। हजारों शरभों का बल एक बलदेव में होता है, दो बलदेवों की शक्ति एक अर्धचकी में रहती है । दो अर्धचक्रियों का बल एक चक्रवर्ती में होता है । एक हजार चक्रवर्तियों का बल एक इन्द्र में होता है । असंख्य इन्द्रों के बल से भी अधिक शक्ति एक तीर्थकर में होती हैं । वातस्व में तीर्थकर के जन्म से ही अतुल बल तथा अप्रतिमवीर्यता नामक एक अतिशय गुण होता है । उस बल की तुलना नहीं हो सकती है ।
प्रश्न- निर्धारण अर्थात् मोक्ष कल्याणक क्या है ?
उत्तर - तीर्थंकर प्रभु अपने केवलज्ञान से तीन लोक के सम्पूर्ण चराचर पदार्थों को जानकर सब भव्य जीवों को हितकारी उपदेश देते हैं । संसार से भवभीत भव्य जनों को मोक्ष मार्ग की ओर उन्मुख कर देते हैं । इस तरह उपदेश देते हुये तीसरे शुक्ल ध्यान को प्रारंभ करके जब वे तेरहवें गुरास्थान से चौदहवें गुणस्थान में आते हैं, तब वहां पर चार अघातिया कर्मों की ७२ और १३ प्रकृतियों का नाश करके अन्त्य समय में अ इ उ ऋ लृ इन पांच श्रल्प प्राण अक्षरों के उच्चारण करने में जितना समय लगता है, उतने समय में वे तीर्थंकर भगवान मोक्ष चले जाते हैं ।
उस समय चारों निकाय के देव स्वर्ग से आकर भगवान के शरीर का दाह संस्कार करते हैं । और वह दाहस्थान पवित्र हुआ समझकर उस स्थान की वह देव पूजा करते हैं । उस पूजा उत्सव को निर्माण किंवा मोक्ष कल्याणक कहते हैं ।
उत्तर पुराण में लिखा है कि भगवान शांतिनाथ के मोक्ष होने पर देवों ने याकर उनके शरीर का अन्तिम संस्कार तथा पूजा की थी। कहा भी हैचतुविधामराः सेवाः निस्तखारूडभक्तयः ।
कृत्यांत्येष्टि तदागत्य स्वं स्वभावासमाधयन ।। १५६० ।।
बड़ी भक्ति को धारण करने वाले आलस्य रहित इन्द्रों सहित चारों निकाय के देव आये और अन्त्येष्टि अर्थात् उन भगवान की अन्तिम पूजा कर अपने-अपने स्थानों को चले गये ।