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गो. प्र. चिन्तामणि उपघात, विहायोगति युगल, प्रत्येक, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग स्वरयुगल, अनादेय, अयश कीर्ति, निर्माण तथा नीच गोत्र इन ७२ प्रकृतियों का नाश
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- अंत समय में वेदनीय की बची हुई एक प्रकृति, मनुष्यगति, मनुष्यायु तथा मनुष्यगत्यानुपूर्वी, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, उच्चगोत्र, यशस्कीर्ति ये बारह तथा तेरहवीं तीर्थङ्कर प्रकृति का भी क्षय करके अ, इ, उ, ऋ, ल इन पांच लघु अक्षरों के उच्चारण में लगने वाले अल्प काल के भीतर वह अयोगी जिन प्रात्मा विकास की चरम अवस्था सिद्ध पदवी को प्राप्त करता है । मुनि दीक्षा के समय इन तीर्थङ्कर भगवान ने सिद्धों को प्रमाण किया था । अब वे स्वयं सिद्ध परमात्मा बन गए । ये सिद्ध परमात्मा समस्त विभाव से मुक्त हो गये हैं, तथा समयसार रूप परिणत हो गए हैं।
___महापुराण में लिखा है कि ऋषभदेव भगवान ने माघ कृष्णा चतुदर्शी के दिन सूर्योदय की प्रभात बेला में पूर्वाभिमुख होकर' प्राप्तपल्यंकः' पल्यकासन को धारण कर कर्मों का नाश किया था----
शरीरत्रितयापाये प्राप्य सिद्धत्व पर्यायं । निजाष्टगुणसंपूर्णः क्षरणवाप्त-तनुवातकः ॥१५५८।।
ऋषभनाथ भगवान औदारिक, तेजस तथा कार्भाग इन तीनों शरीरों का नाशकर, प्रात्मा के अष्ट गुणों से परिपूर्ण सिद्धत्व पर्याय प्राप्त करके क्षण मात्र में लोक के अग्र भाग में पहूँचकर तनु वातवलय को प्राप्त हुये।
अब ये तीर्थकर भगवान सिद्ध परमात्मा बन जाने से समस्त विकल्पों से विमुक्त हो गये हैं । ज्ञान नेत्रों से इनका दर्शन करने पर जो स्वरूप ज्ञात होता है, उसे महापुराण में इन शब्दों द्वारा व्यक्त किया गया है।
नित्यो निरंजन: किचिनो देहादमूर्ति भाक् । स्थितः स्वसुखसादभूतः पश्यन्विश्वममारतम् ॥१५५६।।
अब ये सिद्ध भगवान नित्य, निरजन, अन्तिम शरीर से किंचित न्यूनाकार युक्त, अमूर्त, आत्मा से उत्पन्न स्वाभाविक आनन्द का रस पान करने वाले सम्पूर्ण विश्व का निरन्तर अवलोकन करने वाले हो गये !
प्रश्न-तीर्थङ्करों के अनुपम सामथ्र्य का स्थूल दृष्टान्त क्या है ?
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